Thursday, July 2, 2009

वातायन - जुलाई, २००९


हम और हमारा समय

कामरेड ! आप चुप क्यों हैं ?

देश लुट रहा है -- वे मौन हैं . ऎसे हर अवसर पर उनके चेहरों पर चुप्पी चिपक जाती है. देश हित और सर्वहारा की माला जपने वाली उनकी जुबान पर ताला क्यों लटक जाता है जब सर्वहारा के हित में खर्च किये जाने वाले धन से कोई सिरफिरा और भ्रष्ट राजनीतिक अपनी, अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह और पार्टी के संस्थापक की मूर्तियां गढ़ा और खुदा रहा होता है. जिस धन का वह आपराधिक दुरुपयोग कर रहा होता है वह धन आम लोगों का होता है -- टैक्स के रूप में उनसे उगाहा गया धन. एक लोकतांत्रिक देश में ऎसा हो, इससे बड़ी शर्मनाक बात और क्या हो सकती है. यहां सद्दाम हुसैन की याद ताजा हो उठती है. उसने भी अपने बुत गढ़वाये और खुदवाये थे. सद्दाम तानाशाह था और एक तानाशाह ही कानून और जनता की उपेक्षा कर ऎसे समाज विरोधी कार्य कर सकता है. हमे नहीं भूलना चाहिए कि हर तानाशाह भ्रष्ट होता है. अपने भ्रष्ट कारनामों को वह अपनी तानाशाही की ओट देता है. और यह भी इतिहास सिद्ध है कि हर तानाशाह का दुखद पतन होता है.
वे जिन्हें प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे उन्होंने यह कर डाला. यदि वे उन्हें प्रधानमंत्री बनाने में सफल हो जाते तब देश की क्या स्थिति होती कल्पना की जा सकती है.

धन के ऎसे दुरुपयोग को रोकने और दुरुपयोग करने वालों के लिए कठोर दण्ड का प्रावधान किये जाने के लिए यदि संविधान परिवर्तन की आवश्यकता हो तो वह किया जाना चाहिए. लेकिन संभव है तब उस परिवर्तन के विरोध में कामरेड मुखर हो उठें. लेकिन अभी आप चुप क्यों हैं कामरेड ! देश हित सर्वोपरि है या व्यक्तिहित ? पिछली गलतियों से सबक लेते हुए आप आगे आयें और कुछ और नहीं तो भर्त्सना के दो शब्द ही कहें वर्ना इसके लिए भी इतिहास आपको याद रखेगा, किस रूप में यह आप स्वयं सोच सकते हैं.
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वातायन के जुलाई, २००९ अंक में प्रस्तुत है - मेरे द्वारा अनूदित और संवाद प्रकाशन मेरठ/मुम्बई से शीघ्र प्रकाश्य संस्मरण पुस्तक - ’लियो तोल्स्तोय का अंतरंग संसार’ में संग्रहीत जी.ए.रुसानोव का संस्मरण, वरिष्ठ कवयित्री अंजना संधीर की पांच कविताएं और वरिष्ठ कवि-कथाकार सुभाष नीरव की कहानी.
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मेरे अनुरोध पर वातायन के लिए अंजना जी की कविताएं प्रसिद्ध कहानीकार और कवयित्री इला प्रसाद (यू.एस.ए.) ने उपलब्ध करवायीं हैं. इसके लिए मैं उनका हृदय से आभारी हूं. कविताओं के विषय में इलाजी की छोटी -सी टिप्पणी कविताओं से पूर्व दृष्टव्य है.
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संस्मरण
यास्नाया पोल्याना की यात्रा
(२४-२५ अगस्त, १८८३)

जी.ए. रुसानोव
(गव्रील अन्द्रेयेविच रुसानोव (१८४६-१९०७) एक वकील,
ऑस्त्रोगोझ्स्क के प्रथम सदस्य , फिर खारकोव बार के सदस्य और तोल्स्तोय के अंतरंग मित्र )
अनुवाद : रूपसिंह चन्देल

------उसके बाद तोल्स्तोय इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि नयी पीढ़ी---- सौम्य पेरोव्स्की जैसे सभी ----बरबादी की ओर बढ़ रहे थे, कि उन्होंने प्रकाश नहीं देखा, कि उन्हें शिक्षित कर सही मार्ग पर वापस लाना आवश्यक था.

"शायद आपका कहना ठीक है." मैं बोला, "फिर भी नौजवानों के प्रिय लेखक शेद्रिन हैं. वह उन्हें दूसरों की अपेक्षा अधिक पसंद करते हैं क्योंकि वह राजनीति और समसामयिक मामलों में रुचि लेते हैं."

"और वह उनके प्रेम के पात्र हैं " तोल्स्तोय ने अपने विचार रखे, "मुझे स्वयं शेद्रिन प्रिय हैं. एक लेखक के रूप में वह विकास कर रहे हैं. उनके नवीनतम कार्य में विषाद के संकेत खोजे जा सकते हैं."

फिर बातचीत तुर्गनेव की ओर मुड़ गयी थी.
"क्या तुर्गनेव नास्तिक हैं ?" मैंने पूछा.

"ओह, हां," तोल्स्तोय ने उत्तर दिया ," तुर्गनेव एक भले , प्रतिभा-सम्पन्न और विशाल हृदय वाले व्यक्ति हैं---- मैं उन्हें प्रेम करता हूं और उनके प्रति खेद अनुभव करता हूं---- वह इतना अधिक बीमार हैं --- तुमने सुना इन दिनों वह कैसे हैं ?"

"मैंने अखबारों से प्राप्त नवीनतम समाचार उन्हें बताया. "मैंने वह पढ़ा है " तोल्स्तोय बोले.

"वे कहते हैं कि रूसियों का एक दल उन्हें देखने जायेगा और यह कि ---- एर---- उसका नाम क्या है ? ओगियर ? ---- उन्हें कॉमेडी पढ़कर सुनायेंगे. प्रहसनों के लिए अच्छा समय !" निन्दात्मक स्वर में उन्होंने टिप्पणी की. बहुत अधिक समय नहीं बीता, जब वह पेन पकड़ने की क्षमता रखते थे. उन्होंने मुझे बहुत ही सहृदय और प्रेरणास्पद पत्र लिखा था कि लिखना बंद नहीं करूं."

"और आपने लिखने का विचार किया ? मेरा मतलब कथा-साहित्य ."

"हां, निश्चय ही. यदि कोई व्यक्ति लिख सकता है, उसे अवश्य लिखना चाहिए. यदि कोई व्यक्ति बोल सकता है तो उसे अवश्य बोलना चाहिए."

"क्या यह सही है कि आप समाचार पत्र और अपने कार्यों की समीक्षाएं नहीं पढ़ते ?"

"ऎसा है. लेकिन हाल में मैंने नियम में परिवर्तन किया है. रुस्काया मिस्ल में ग्रोमेस्का का आलेख पढ़ा. एक उत्कृष्ट आलेख है."

फिर सेल्फ में रखी अपनी पुस्तकों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा :

"मुझे भय है कि सामान्यतः हमारा और विशेष रूप से मेरा कुछ भी शेष नहीं रहेगा."

"आप ऎसा क्यों कहते हैं ?" मैंने विस्मित होते हुए पूछा.

"क्योंकि हम इतना अधिक लिखते हैं. ध्यान से देखो हम सभी ने विपुल मात्रा में लिखा है. सदियों तक जो कुछ बचा रहता है वह मात्रा में विशाल कभी नहीं होता."

"शेक्सपीयर के विषय में क्या सोचते हैं ?" मैंने पूछा.

"शेक्सपीयर मुझे कभी बहुत प्रिय नहीं रहा ---- शेक्सपीयर के बारे में इतना संभ्रम फैलाया गया कि उसके विरुद्ध बोलने का साहस कोई भी नहीं जुटा पाता. लेकिन मैंने उसके विषय में कभी अधिक नहीं सोचा."

बातचीत के दौरान ---- मैंने रूसी और फ्रांसीसी आलोचकों द्वारा उनके विषय में व्यक्त विचारों का उल्लेख किया .

"बहुत देर से" मेरे कथन के उत्तर में तोल्स्तोय ने कहा, "मेरे प्रति उनके हृदय परिवर्तित देखकर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ था. पहले उन लोगों ने निर्दयतापूर्वक मुझे बुरा-भला कहा और एक विचारक के रूप में मुझे स्वीकार करने से इंकार कर दिया था. याद करो ’वार एण्ड पीस" . वह सब कैसा था ? उन दिनों मैं ऎसी चीजों पर सोच-विचार करता था.अन्नेन्कोव का आलेख याद है ? कई पहलुओं से वह बदनाम करने वाला था, लेकिन अन्य सभी आलोचकों की भर्त्सना के बाद मैंने आराम के साथ उसे पढ़ा था---- उन्होंने किस प्रकार मेरी भर्त्सना की थी. मैं उन सब खराब चीजों को याद भी नहीं करना चाहता जो उन्होंने ’अन्ना कारनिना’ के विषय में लिखी थीं.’

अन्ना कारनिना के विषय में दो दिन पूर्व ट्रेन में एक छात्रा द्वारा व्यक्त कुतूहलपूर्ण विचार की मुझे याद हो आयी और मैंने तोल्स्तोय से कहा :

"वे कहते हैं कि ’अन्ना कारनीन” को ट्रेन के नीचे फेंक देना आपकी हृदयहीनता है. निश्चय ही आप उससे यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह आजीवन उस उबाऊ अलेक्सेई अलेक्जान्द्रोविच की कैद में रहती ."

तोल्स्तोय मुस्कराये.

"इसने मुझे याद दिला दिया कि एक बार पुश्किन ने अपने एक मित्र से क्या कहा था. ’तुम्हे पता है तात्याना ने मेरे साथ क्या चालाकी की थी ?’ वह बोले थे, ’उसने शादी कर ली थी. उससे मैं यह अपेक्षा बिल्कुल नहीं करता था.’ अन्ना कारेनिना में मैंने बिलकुल वही बात कही है. उन्होंने उसी रूप में चीजें की जिस रूप में वे वास्तविक जीवन में करते बजाय इसके कि जैसा मैं उनसे करवाता."

"काउण्टेस पास्केविच द्वारा ’वार एण्ड पीस’ के फ्रेंच अनुवाद के बाद फ्रेंच आलोचकों के दृष्टिकोण में आए परिवर्तन को देखकर मुझे प्रसन्नता हुई " उन्होंने कहना जारी रखा. मास्को प्रदर्शनी में मुझसे मिलने वाले फ्रांसीसी लोगों ने जो विचार व्यक्त किये उससे मैं आश्चर्यचकित था. मैं महसूस कर सका कि ’वार एण्ड पीस’ में अभिव्यक्त मेरे ऎतिहासिक दृष्टिकोण को स्वीकृति मिलनी प्रारंभ हो गयी है. तुम्हे याद है जब पहली बार पुस्तक प्रकाशित हुई तब उसे किस प्रकार ग्रहण किया गया था ?"

"मुझे याद है, लेकिन दूसरी धारणाएं भी हैं. " उदाहरण के लिए , स्वर्गीय पोपोव के विचार, जिन्होंने १८१२ के युद्ध का इतिहास लिखा और जो पूरी तरह से अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ. ’दि नीवा’ में मैंने उनके विचार पढ़े थे."

"पोपोव कौन थे ? अंद्रेई निकोलायेविच ? हां, वह क्या सोचते थे, उन्होंने मुझे बताया था."

इस बिन्दु पर बातचीत का विषय बदल गया था, लेकिन क्या यह मुझे याद नहीं. केवल यह कहना याद है कि किस प्रकार गोन्चारोव की लेखकीय गतिविधियों की पचासहवीं वर्षगांठ के अवसर पर महिलाओं का एक प्रतिनिध मंडल उनके अभिनंदन के लिए उनसे मिला था, और यह कि विलंब से ही सही पढ़ने के प्रति लोगों की अभिरुचि में इतनी उन्नति हुई है कि किसी लेखक के विषय में लोगों को किसी आलोचक के मूल्याकंन की अब दरकार नहीं रही है.

"गोंचारोव को लिखते हुए पचास वर्ष हो चुके ?"

"जी हां ."

"मुझे यह जानकारी नहीं थी. मुझे गोंचारोव के लिए खेद अनुभव हो रहा है. वह इतने बूढ़े और अकेले हैं और भुला दिए गये हैं----- वह बहुत कष्ट पा रहे हैं."

"किससे ?"
"घोर अपमान से ."
मैं पुनः तोल्स्तोय के काम पर वापसे लौट आया और बोला, "दूसरी चीजों के साथ उनका ’चाइल्ड हुड’ और तुर्गनेव का ’ए हण्टर्स स्केचेज’ लगभग एक ही समय प्रकाशित हुए थे. (ए हण्टर्स स्केचेज १८४७-५२ के मध्य और ’चाइल्डहुड’ १८५२ में ) और जब कि ’ए हण्टर्स स्केचेज’ में चित्रण के कई अनाधुनिक अंश हैं (उदाहरण के लिए छोटे बच्चे ’बेझिन मीड’ का भावुक चित्रण) जबकि चाइल्डहुड में अनाधुनिकता या उस जैसा होने की जोखिम नहीं दिखती . इस पर तोल्स्तोय ने उत्तर दिया कि उनका ’चाइल्डहुड’ चाशनी जैसा है (मुझे आशंका है कि तोल्स्तोय ने ठीक यही शब्द इस्तेमाल नहीं किया था, लेकिन जो भी किया था उसका भाव यही था) . स्वभावतः मैंने मौन स्वीकृति नहीं दी और अपना प्रतिरोध दर्ज किया. तोल्स्तोय ने आगे कोई टिप्पणी नहीं की.

अंत में उन्होंने कहा कि "तुर्गनेव की जिस एक मात्र पुस्तक को मैं पसंद करता हूं वह है ’ए हण्टर्स स्केचेज’ . निश्चित ही कोई भी लोक जीवन की अभिव्यक्ति उस तरह नहीं कर सकता जैसा कि उन्होंने किया है. मैंने उनके शेष कार्य का अधिक अध्ययन नहीं किया , और मेरा विश्वास है कि वह उन्हें अधिक समय तक जीवित नहीं रखेगा. मुझे लगता है कि भावी पीढ़ियों के लिए तुर्गनेव उतने ही अल्पज्ञात होंगे जितना जुकोव्स्की. हालांकि वह अत्यधिक भले , और स्नेही और अनुग्रही हैं, और उन्होंने बहुत से लोगों की सहायता की है."

उनकी गद्य कविताओं की चर्चा करते हुए उन्होंने आगे कहा --

"मैंने उन्हें प्रसन्नतापूर्वक पढ़ा, लेकिन सोचा कि तीस वर्ष पहले उन्होंने अधिक प्रभाव डाला होता."

मैंने "सांग ऑफ लव ट्रम्फैण्ट" का उल्लेख किया. तोल्स्तोय ने विषय को घृणित ठहराया.

"लेव निकोलायेविच , क्या आपने नताशा रोस्तोवा का रूपचित्र जीवन से खींचा था." मैंने पूछा.

"अधिकांशतया."

"और आंद्रेई बोल्कोन्स्की ?"

"नहीं, उसका नहीं---- मेरे कुछ चरित्र जीवित आदर्श से ग्रहण किये हैं, कुछ नहीं. पहले वाले कम सफल हुए. यद्यपि जीवन से चित्रण सदैव अधिक सजीव होता है. लेकिन वे एकपक्षीय हो जाते हैं."

"आपके प्रारंभिक दौर में, ’वार एण्ड पीस’ से पहले , बहुत से प्रतीतात्मक उद्धरण मिलते हैं, जबकि ’वार एण्ड पीस’ में कुछ , और ’अन्ना कारनिना’ में बिलकुल ही नहीं हैं."

"एक दिन व्यक्ति को मजुर्कस (Mazurkas) से बाहर विकास करना ही होता है. " मुस्कराते हुए लेव निकोलायेविच ने कहा.

हमारी बातचित दॉस्तोएव्स्की पर आ टिकी.

"नोट्स फ्राम अ डेड हाउस ’ (दॉस्तोएव्स्की ) प्रशंसा योग्य कार्य है, लेकिन उनके दूसरे कामों के विषय में मैं अधिक नहीं सोचता." तोल्स्तोय बोले, "कुछ विशिष्ट स्थानों की ओर मेरा ध्यान खींचा गया, और वास्तव में वे अद्भुत थे, लेकिन संपूर्णता में --- संपूर्णता में मैंने उन्हें भयानक पाया. कृत्रिम भाषा, मूल चरित्र खोजने का सतत प्रयास, फिर उनका स्थूल चित्रण. मुख्य बात यह, कि दॉस्तोएव्स्की संलाप और संलाप करते हैं, और अंत में पाठक अपने को कोहरे में पाता है कि वह कहना क्या चाहते थे."

"आपने ’दि करमाज़ोव ब्रदर्श पढ़ा’ ?"

"उसे समाप्त नहीं कर सका ."

"उस पुस्तक के साथ परेशानी" मैं बोला , "यह है कि उसके सभी चरित्र, १५ वर्ष की लड़की से लेकर, सभी एक ही ढंग से बोलते हैं---- लेखक के ढंग से ."

"न केवल वे एक ही और समान ढंग से , लेखक के स्वर में बोलते हैं, बल्कि वे एक ही और समान विचार व्यक्त करते हैं जैसा कि लेखक करता है और क्रत्रिम भाषा में."

"लेकिन ’क्राइम एण्ड पनिशमेण्ट’ उनका अच्छा उपन्यास है . उसके विषय में आपके क्या विचार हैं. "

"क्राइम एण्ड पनिशमेण्ट ? हां, वह अच्छा है. लेकिन जब आप प्रारंभ के कुछ चरित्रों को पढ़ लेते हैं, तब आप जान जाते हैं कि पूरे उपन्यास में उसीका अनुकरण होगा शेष उसीका दोहराव होता है जो आप प्रारंभ में पढ़ चुके होते हैं."

"लेव निकोलायेविच, आपका ’चाइल्डहुड’ बच्चों को पढ़ने के लिए दिए जाने के लिए किस उम्र के बच्चों को दिया जाना आप उचित मनते हैं."

"किसी आयु के नही."

"किसी आयु के नहीं."

"मैं सोचता हूं नहीं. मैं मानता हूं ’चाइल्डहुड’ और ’ब्वॉयहुड’ पुस्तकें बच्चों के लिए नहीं हैं. ’दि प्रिजनर ऑफ कॉकेशस’, और ’झिलिन’ (zhylin) और कोस्तिलिन (Kostylin) --- वे भिन्न हैं. " तोल्स्तोय बोले, "मैं उन दोनों पुस्तकों को प्यार करता हूं ,हालांकि इन्हें और अच्छा लिखा जा सकता था."

"किस रूप में ?"

"भाषा और सरल की जा सकती थी. कुछ अकलात्मक लोक अभिव्यक्तियों को बदला जा सकता था, लेकिन मैं ऎसा नहीं कर सकता. मैं सदैव ऎसा ही लिखता हूं." हल्की मुस्कान के साथ वह बोले.

"नहीं." क्षणभर रुककर तोल्स्तोय आगे बोले, "वार एण्ड पीस’ के अतिरिक्त कोई भी ऎतिहासिक उपन्यास लिखने में मुझे सफलता नहीं मिली. मैंने ’पीटर दि ग्रेट’ के समय को लेकर उपन्यास लिखना चाहा, फिर दिसम्बरवादियों को लेकर. ’पीटर दि ग्रेट’ के काल को विषय बनाकर लिखने में मैं असमर्थ रहा क्योंकि वह बहुत पहले की बात थी . हमसे बिलकुल भिन्न लोगों के हृदय और मर्म के रहस्य को समझना मेरे लिए बहुत कठिन था. और दिसम्बरवादियों पर लिखना ठीक उसके विपरीत कारणों से कठिन प्रतीत हुआ. वे बहुत निकट और बहुत जाने समझे थे. बड़ी मात्रा में उस समय के विवरण, संस्मरण और पत्र मेरे पास हैं और मैं निश्चित ही उनको लेकर छटपटाता रहता हूं."

"दिसम्बरवादियों पर लिखे जाने वाले उपन्यास में छोटा निकोलई बोल्कोन्स्की एक चरित्र के रूप में नहीं होता ?"

"ओह, हां," तोल्स्तोय ने कहा. उनके चेहरे पर प्रसन्न मुस्कान फैल गयी थी. फिर कुछ क्षण रुककर , "और इस प्रकार मैंने आपके ऑस्त्रोगोज्स्क की यात्रा कभी नहीं की. दिसम्बरवादियों पर अपने उपन्यास के संबन्ध में निश्चित रूप से मैं ऑस्त्रोगोज्स्क जाना चाहता था."

"तेव्याशॉव्स ने मुझे यह बताया था . आप उनके साथ ठहरना चाहते थे. क्या ऎसा नहीं था ?"

"नहीं. कौन तेव्याशॉव्स ? तेव्याशॉव्स कौन हैं ? आह, हां. रेलेयेव, लगता है, तेव्याशॉव्स के साथ उसका विवाह हुआ है ?"

"जी."

"क्या आपका ऑस्त्रोगोज्स्क इतनी उन्नत और समृद्ध जगह है, जैसा कि मुझे बताया गया था."

"मैं क्या कहूं ! निजी तौर पर मैं उसे ऎसा नहीं पाता."

इस बिन्दु पर किसी कारण से बातचित पुनः तुर्गनेव की ओर मुड़ गयी थी.

"उनका प्रकृति चित्रण असाधारण है." मैं बोला.
"अतुलनीय." तोल्स्तोय ने अनुमोदन किया.

फिर हमने फ्लॉबर्ट और डॉडेट के विषय में चर्चा की. तोल्स्तोय ने कहा कि उन्हे डॉडेट (Daudet) का ’इवान्गेलिस्ते’ (Evangeliste) पसंद नहीं आया था, लेकिन बहुत समय पहले उन्होंने फ्लाबर्ट का ’मादाम बावेरी ’ (Madame Bovary) पढ़ा था, और हालांकि वह यह भूल गये थे कि उसका विषय क्या था लेकिन उन्हें यह याद था कि उन्होंने उसे पसंद किया था.

अन्य बातों के साथ उन्होंने कहा --

"मैंने एक कहानी छोटे बच्चों के लिए लिखी है. मैं प्रायः इसे उन्हें सुनाता हूं. उसमें केवल यही बात कही गयी है कि एक छोटा बालक था, जिसे सात खीरे मिले. उसमें से उसने सबसे छोटे को सबसे पहले खाया, फिर उसके बाद वाले को, फिर उसके बाद----- इस प्रकार उसने सभी खा लिए. आप बच्चों की प्रसन्नता तब देख सकते हैं जब मैं उस स्थान पर पहुंचता हूं जहां वह बालक आखिरी सबसे बड़े खीरे को खाना प्रारंभ करता है." और हंसते हुए तोल्स्तोय ने बाहें फैलाकर बताया कि आखिरी खीरा कितना बड़ा था.

हम पुनः कला पर चर्चा करने लगे और तोल्स्तोय लेर्मेन्तोव के विषय में बताने लगे.

"कितने दुख की बात है कि उनकी मृत्यु युवावस्था में हो गयी. उसमे कितनी जबर्दस्त प्रतिभा थी. उसने क्या नहीं किया. वह उन लोगों की भांति सीधे शुरू हो गया था जिन्हें सम्पूर्ण सामर्थ्य प्राप्त होती है. उसके लेखन में आपको कुछ भी सतही नहीं मिलेगा." उन्होंने कहा, "सतही चीजें लिखना बहुत सहज है, लेकिन उसका प्रत्येक शब्द इस प्रकार लिखा गया है मानो उसे नैसर्गिक प्रतिभा प्राप्त थी."

’तुर्गनेव एक साहित्यिक व्यक्ति थे, " तोल्स्तोय ने आगे कहा , "पुश्किन भी थे, लेकिन गोंचारोव तुर्गनेव से अधिक साहित्यिक व्यक्ति थे. लेर्मेन्तोव और मैं साहित्यिक व्यक्ति नहीं हैं."

इस बातचीत के दौरान मैंने अपना अनुभव बताया कि पुश्किन को पढ़ते हुए एक ऎसे व्यक्ति की उपस्थिति की प्रतीति होती है जो चतुर, अच्छे स्वभाववाला, प्रसन्न और यद-कदा विनोदशील था.

"सच" तोल्स्तोय ने कहा

दुख प्रकट करते हुए हमने तुर्गनेव की बीमारी पर चर्चा की.

"कुछ दिन पहले तक वह हृष्ट-पुष्ट और स्फूर्तिवान वृद्ध व्यक्ति थे." तोल्स्तोय ने कहा.

"वर्डोट के साथ उनके सम्बन्ध कैसे हैं ?"

"मुझे बताया गया, विशुद्ध आध्यात्मिक." तोल्स्तोय ने उत्तर दिया.

"मैंने सुना कि उनके एक बेटी है ."

"लेकिन वह वर्डोट की नहीं है. " तोल्स्तोय बोले, "और पुत्री के विषय में कुछ संदेह हैं. मुझे उनके लिए बहुत खेद है."

"आप ऎसा इसलिए कहते हैं क्योंकि वह खराब स्थिति में हैं ."

"वह नहीं जानते कि कितनी ईमानदारी से वर्डोट उनकी देखभाल करती है. निश्चित ही कुछ ऎसे क्षण अवश्य होंगे जब वह सोचती होगी, ’यदि अंत तेजी से आ जाए."

"लोग लिखते हैं कि वह रूस लौटने का स्वप्न देखते हैं."

"हां, तुर्गनेव ने अंत में स्पष्ट अनुभव किया ----." तोल्स्तोय ने कहना प्रारंभ किया, लेकिन वाक्य अधूरा छोड़ दिया. "फ्रांस के एक घर में रह रहे उस वृद्ध व्यक्ति का विचार घृणित और दयनीय है. हां, रूस में होने की ललक है उनमें ---- वह इस ललक को पूरा नहीं कर सकते."

"उन्होंने लिखा कि एक ऑपेरा हाउस से उन्हें जोड़ने के लिए एक टेलीफोन लगाया गया है."

"आह, हां . वह खराब स्थिति में हैं." तोल्स्तोय ने दोहरया, "सोचिए, एक बूढ़ा व्यक्ति मर रहा है, मृत्यु से भयभीत है वह और टेलीफोन द्वारा ऑपेरा संगीत में सांत्वना खोजता है. निश्चित ही बहुत तुच्छ सांत्वना---."

हमने टेलीफोन के भविष्य पर चर्चा प्रारंभ कर दी.

"महत्वपूर्ण और चमत्कारिक भविष्य." तोल्स्तोय बोले, " रेलवे और टेलीग्राफ बड़ा परिवर्तन लाये, लेकिन टेलीफोन इनसे भी बड़ा परिवर्तन लायेगा."

"आप ऎसा कैसे सोचते हैं ?"

"निम्न बातों की आप कल्पना करें. जार जनता को संदेश देना चाहते हैं. वह बोलते हैं और एक साथ शब्दशः वह संदेश रूस की प्रत्येक क्षेत्रीय सरकारों के प्रशासनिक केन्द्रों में सुना जाता है."

हमने रूस की वर्तमान स्थिति पर चर्चा प्रारंभ की.

"यह विस्मयकरी है. विस्मयकारी इसलिए कि सेण्ट पीटर्सबर्ग में क्या हो रहा है !" तोल्स्तोय ने कहा, " जार अलेक्जेंण्डर को जनता की भलाई के लिए कुछ करने की सलाह देने के बजाय, अधिकारी वर्ग रोड़े अटकाने के हर संभव प्रयत्न करते रहे. जनता असंतुष्ट , आशान्वित, हताश थी और उसमें कुछ उत्तेजना थी. जार की स्थिति बैर योग्य नहीं थी . उसके पूर्ववर्तियों ने उसके लिए चीजें खराब कर दीं थीं. उसने खराब चीजों से किसानों को मुक्त किया. लोगों की दृष्टि में वह हीरो बन गया. लेकिन वर्तमान जार उनके लिए कुछ भी करने का इच्छुक नहीं है, फिर भी उन्हें उससे अपेक्षाएं हैं. सारी बातें आश्चर्यजनक हैं. आश्चर्यजनक अंधापन. केवल एक बात जो वह उनसे कह सकता है -- "आभिजात्यवर्ग की आज्ञा मानो." वह किसानों से कहता है कि कृषि अनुदान में वृद्धि की अपेक्षा मत करो ; क्योंकि कुछ नहीं होगा. ऎसी बातें कहने का साहस उसमें कैसे होता है ? . किसानों की यह मांग है. हर व्यक्ति इस विषय पर बातें कर रहा है और लिख रहा है, और वह इस प्रकार की बातों से इंकार करता है . वह अपने शब्द वापस लेने के लिए विवश हो सकता है ? संभव है वह परिदृश्य से पूरी तरह ओझल हो जाये---- वह मर सकता है ---- और तब अनुदान में वृद्धि हो सकती है, अथवा काफी समय बाद प्रशासनिक व्यवस्था परिवर्तित हो सकती है, और जानते हो तब क्या होगा ?" तोल्स्तोय का स्वर उत्तेजित था.

हम शेद्रिन के विषय में पुनः बातें करने लगे.

"तुमने उनका नवीनतम ग्राम्यगीत पढ़ा ?" उन्होंने पूछा, "मीनिकाओं का संकट याद है ?"

"निश्चय ही " मैंने उत्तर दिया, "और उन छैलों की भी ."

"एक आनंदप्रद चीज," तोल्स्तोय बोले, और छैलों के विषय में एक छोटा-सा अंश उद्धृत किया. "वह अच्छा लिखते हैं. " उन्होंने निष्कर्ष दिया, "और वह कितनी मौलिक भाषा प्रयोग करते हैं !"

"जी" मैंने सहमति प्रकट करते हुए कहा, "दॉस्तोएव्स्की की भाषा भी मौलिक है."

"ओह, नहीं," तोल्स्तोय ने विरोध किया, "शेद्रिन की भाषा बहुत ही सुस्पष्ट , उत्तम, विशुद्ध जन- भाषा है, जबकि दॉस्तोएव्स्की की कृत्रिम और अस्वाभाविक है."

"----- मैंने एक सूचना पढ़ी थी कि इस वर्ष कला पर एक आलेख खुदोजेस्त्वेन्नी जर्नल को आप देने वाले हैं. क्या यह सच है ?"

"हां, मैंने एक आलेख का वायदा किया था. मैं नहीं जानता कि उन्होंने इस सूचना को प्रकाशित क्यों किया. मैंने सम्पादक से कहा था कि ऎसा नहीं करें, लेकिन उन्होंने मेरे अनुरोध की उपेक्षा की. आलेख लिखा जा चुका है, लेकिन मुझे उस पर एक दृष्टि और डालनी है और उसमें संशोधन करना है. मैं उसे यों ही नहीं दे सकता, और उसके लिए समय की अपेक्षा होगी जो कि इस समय मेरे आस नहीं है."

"मेरा विश्वास है कि तुर्गनेव अपने काम पर बार-बार दृष्टि डालते थे." मैंने कहा.

"न---हीं---s---s ." तोल्स्तोय ने हिचकते हुए कहा. "वह तेजी से लिखते थे और बहुत कम संशोधन करते थे . मैंने उनकी ’वर्कबुक्स’ देखी थीं. वह ’बाउण्ड कॉपी-बुक्स’ में लिखते थे. उहोंने मुझे दिखाया था."

"मैं इस बात के प्रभाव में था कि वह गोगोल की (लेखन) पद्धति के अनुसार लिखते थे ." मैं बोला.

"गोगोल की पद्धति क्या थी ?"

"गोगोल रचनाकारों को सलाह देते थे कि अपने पहले ड्राफ्ट को वह छुपाकर रख दें और लंबा समय गुजर जाने के बाद उसे पुनः उठायें , उसे संशोधित करें, और उसे भी रख दें, फिर उसे संशोधित करें और फिर रख दें ----- और लगातार ---- कम से कम आठ बार ---- ऎसा करें"

"यह एक अच्छी पद्धति है---- किसी पाण्डुलिपि का कुछ समय तक अनछुआ पड़ा रहना. आप जब उसे दोबारा पढ़ते हैं तब दृष्टि भिन्न हो चुकी होती हैं."
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कविताएं



अंजना संधीर की पांच कविताएं

( अंजना जी की कविताओं में भाषा का सहज प्रवाह है और मौलिकता भी। अपने परिवेश और सोच, दोनों का सम्मिलित सुन्दर शब्द- चित्र हैं उनकी कविताएँ। उनमें धार है और वे सीधे चोट करती हैं। मुझे बेहद अच्छी लगती हैं. - इला प्रसाद (यू.एस.ए.)


(१) अमरीका हड्डियों में जम जाता है

वे ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत "हाइवे"
जिन पर चलती हैं कारें--
तेज रफ़्तार से,कतारबद्ध, चलती कार में चाय पीते-पीते,
टेलीफ़ोन करते, 'टू -डॊर' कारों में,रोमांस करते-करते,
अमरीका धीरे-धीरे सांसों में उतरने लगता है।

मूँगफ़ली और पिस्ते का एक भाव
पेट्रोल और शराब पानी के भाव,
इतना सस्ता लगता है सब्जियों से ज्यादा मांस
कि ईमान डोलने लगता है।
मँहगी घास खाने से तो अच्छा है सस्ता मांस ही खाना
और अमरीका धीरे-धीरे स्वाद में बसने लगता है।

गर्म पानी के शावर
टेलीविजन के चैनल, सेक्स के मुक्त दृश्य,
किशोरावस्था से 'वीकेन्ड' में गायब रहने की स्वतंत्रता
'डिस्को' की मस्ती, अपनी मनमानी का जीवन,
कहीं भी, कभी भी, किसी के भी साथ
उठने- बैठने की आजादी......
धीरे-धीरे हड्डियों में उतरने लगता है अमरीका।

अमरीका जब साँसों में बसने लगा
तो अच्छा लगा, क्योंकि साँसों को पंखों की
उड़ान का अंदाजा हुआ।
और जब स्वाद में बसने लगा अमरीका
तो सोचा खाओ, इतना सस्ता कहाँ मिलेगा ?
लेकिन अब जब हड्डियों में बसने लगा है अमरीका,
तो परेशान हूँ।

बच्चे हाथ से निकल गए,वतन छूट गया!
संस्कृति का मिश्रण हो गया ।
जवानी बुढ़ा गई,सुविधाएँ हड्डियों में समा गईं
अमरीका सुविधाएँ देकर हड्डियों में समा जाता है!!

व्यक्ति वतन को भूल जाता है
और सोचता रहता है--
मैं अपने वतन को जाना चाहता हूँ।
मगर, इन सुखॊं की गुलामी तो मेरी हड्डियों में
बस गई है।
इसीलिए कहता हूँ कि
तुम नए हो,
अमरीका जब साँसों में बसने लगे,
तुम उड़ने लगो, तो सात समुंदर पार
अपनों के चेहरे याद रखना।
जब स्वाद में बसने लगे अमरीका,
तब अपने घर के खाने और माँ की रसोई याद करना ।
सुविधाओं में असुविधाएँ याद रखना।
यहीं से जाग जाना.....
संस्कृति की मशाल जलाए रखना
अमरीका को हड्डियों में मत बसने देना ।
अमरीका सुविधाएँ देकर हड्डियों में जम जाता है!र

(2) तुम अपनी बेटियों को......
तुम अपनी बेटियों को
इन्सान भी नहीं समझते
क्यों बेच देते हो अमरीका के नाम पर?
खरीददार अपने मुल्क में क्या कम हैं कि.....
बीच में सात समुंदर पार डाल देते हो?
जहाँ से सिसकियाँ भी सुनाई न दे सकें
डबडबाई आँखॆं दिखाई न दे सकें
न जहाँ तुम मिलने जा सको
न कोई तुम्हें कुछ बता सके
कभी वापस आएँ भी तो
लाशॆं बने शरीर....जिन पर गहने और
मंहगे कपड़े पड़े हों.....!
तुम्हारी शान बढ़ाएँ और तुम्हारे पास भी
बिना रोये लौट जाएँ
उसी सोने के पिंजरे में
जहाँ अमरीका की कीमत
मजदूरी से भी चुकता नहीं होती !
(3) कैसे जलेंगे अलाव
ठंढे मौसम और
ठंढे खानों का यह देश
धीर-धीर मानसिक और शारीरिक रूप से भी
कर देता है ठण्ढा।
कुछ भी छूता नहीं है तब
कँपकँपाता नहीं है तन
धड़कता नहीं है मन
मर जाता है यहाँ , मान, सम्मान और स्वाभिमान।
बन जातीं हैं आदतें दुम हिलाने की
अपने ही बच्चों से डरने की
प्रार्थनाएँ करने की
छूट जाते हैं सारे रिश्तेदार
भूळ जाती है खुशबू अपनी मिट्टी की
बुलाता नहीं है तब वहाँ भी कोई।
आती नहीं है चिट्टी किसी की
जिनकी खातिर मार डाला अपने स्वाभिमान को।
उड़ जाते हैं वे बच्चे भी
पहले पढ़ाई की खातिर
फ़िर नौकरी, फ़िर ढूँढ़ लेते हैं साथी भी वहीं ।
बड़ी मुश्किलों से बनाए अपने घर में भी
लगने लगता है डर
अकेले रहते।
सरकारी नर्सें आती हैं, कामकाज कर जाती हैं।
फ़ोन कर लेते हैं कभी
आते नहीं हैं बच्चे ।
उनके अपने जीवन हैं
अपने माँ-बाप, भाई-बन्धु और देश तो
पहले ही छॊड़ आये थे वो
अब ये भी छूट गए
माया मिली न राम!
सोचते हैं
धोबी के कुत्ते बने, घर के न घाट के।
घंटों सोचते रह्ते हैं।
खिड़की से पड़ती बर्फ़ धीरे-धीरे
हड्डियों पर भी
पड़ने लगती है।
काम की वजह से मजबूरी में
खाया बासी खाना उम्र भर
रहे ठण्ढे मौसम में
अब सबकुछ ठंढा -ठंढा है
मन पर पड़ी ठंढक में
भला सोचिए, कैसे जलेंगे अलाव?
(4) सभ्य मानव
ईसा!
मैं मानव हूँ।
तुम्हें इस तरह सूली से नीचे नहीं देख सकता!

नहीं तो तुममें और मुझमें क्या अंतर?
बच्चों ने आज
कीलें निकाल कर तुम्हें मुक्त कर दिया
क्योंकि नादान हैं वे
तुम्हारा स्थान कहाँ है
वे नहीं जानते
वे तो हैरान हैं
तुम्हें इस तरह कीलों पर गड़ा देखकर
मौका पाते ही,
तुम्हारी मूर्ति क्रास से अलग कर दी उन्होंने
पर मैं...
मैं सभ्य मानव हूँ
दुनिया में प्रेम, ममत्व, वात्सल्य, उपदेश,
सूली पर टँगा ही उचित है
अत: आओ,
बच्चों की भूल मैं सुधार दूँ
तुम्हें फ़िर कीलों से गाड़ दूँ
क्रास पर लटका दूँ
ताकि, तुम ईसा ही बने रहो।
(5) ओवरकोट
काले-लम्बे
घेरदार ,सीधे
विभिन्न नमूनों के ओवर कोट की भीड़ में
मैं भी शामिल हो गई हूँ।
सुबह हो या शाम, दोपहर हो या रात
बर्फ़ीली हड्डियों में घुसती ठंढी हवाओं को
घुटने तक रोकते हैं ये ओवरकोट।
बसों में,सब वे स्टेशनों पर इधर-उधर दौड़ते
तेज कदमों से चलते ये कोट,
बर्फ़ीले वातावरण में अजब सी सुंदरता के

चित्र खींचते हैं।
चाँदी सी बर्फ़ की चादरें जब चारों ओर बिछती हैं
उन्हें चीर कर जब गुजरते हैं ये कोट
तब श्वेत-श्याम से मनोहारी दूश्य
ऐसे लगते हैं
मानों किसी गोरी ने
बर्फ़ीली चादरों को नजर से बचाने के लिए
ओवरकोट रूपी तिल लगा लिया हो!
*****

डाo अन्जना संधीर का जन्म १ सितम्बर, को रुड़की (उत्तर प्रदेश) में हुआ था.
बहुआयामी प्रतिभा की धनी अंजना जी मनोविज्ञान में पी . एच .डी हैं.
लेखन : हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती और उर्दू में समान अधिकार से लेखन। कई विधाओं - गजल,
कविता, संस्मरण, निबंध, अनुवाद, सम्पादन एवं हिन्दी शिक्षण पाठ्य-पुस्तक लेखन- में एक साथ सक्रिय।
प्रकाशित कृतियाँ - "बारिशों का मौसम", "धूप छाँव और आंगन", "मौजे-सहर", "तुम मेरे पापा जैसे नहीं हो" "अमरीका हड्डियों
में जम जाता है", " संगम" "अमरीका एक अनोखा देश", लर्न हिन्दी एंड हिन्दी फ़िल्म सांग्स","अहमदाबाद से अमरीका"। दूरदर्शन के लिए "स्त्री- शक्ति" सीरियल का निर्माण।
"यादों की परछाइयाँ" और "इजाफ़ा" का उर्दू
से हिन्दी में अनुवाद।
सम्पादन: " प्रवासी हस्ताक्षर", "सात समुन्दर पार से", ये कश्मीर है", प्रवासिनी के बोल " और "प्रवासी - आवाज"।
पुरस्कार: गुजरात उर्दू साहित्य- अकादमी पुरस्कार , गुजरात हिन्दी साहित्य अकादमी पुरस्कार, "तुलसी
सम्मान"(लखनऊ), "अदिति साहित्य शिखर सम्मान"(गाजियाबाद), अखिल भारतीय कविसभा(दिल्ली) का "काव्यश्री" और "विक्रमशिला" का "साहित्यभूषण" पुरस्कार। उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत। इसके अतिरिक्त अमेरिका की विभिन्न संस्थाओं द्वारा विदेश में हिन्दी-
सेवा के लिए कई बार पुरस्कृत।
व्यवसाय : पत्रकारिता से आरम्भ कर अमेरिका में कोलम्बिया विश्वविद्यालय , न्यूयार्क में कई वर्षॊं तक हिन्दी का अध्यापन। आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन, न्यूयार्क में उल्लेखनीय भूमिका। "विश्व मंच पर
हिन्दी" का सम्पादन और प्रवासी-हिन्दी साहित्यकारों की पुस्तक-प्रदर्शनी का आयोजन।
संपर्क : एल-१०४, शिलालेख सोसाइटी, अहमदाबाद - ३८०००४
गुजरात, भारत
ईमेल; anjana_sandhir@
yahoo.com

कहानी




रंग बदलता मौसम

सुभाष नीरव

पिछले कई दिनों से दिल्ली में भीषण गरमी पड़ रही थी लेकिन आज मौसम अचानक खुशनुमा हो उठा था। प्रात: से ही रुक-रुक कर हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। आकाश काले बादलों से ढका हुआ था। धूप का कहीं नामोनिशान नहीं था।
मैं बहुत खुश था। सुहावना और खुशनुमा मौसम मेरी इस खुशी का एक छोटा-सा कारण तो था लेकिन बड़ा और असली कारण कुछ और था। आज रंजना दिल्ली आ रही थी और मुझे उसे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रिसीव करने जाना था। इस खुशगवार मौसम में रंजना के साथ की कल्पना ने मुझे भीतर तक रोमांचित किया हुआ था।
हल्की बूंदाबांदी के बावजूद मैं स्टेशन पर समय से पहले पहुँच गया था। रंजना देहरादून से जिस गाड़ी से आ रही थी, वह अपने निर्धारित समय से चालीस मिनट लेट चल रही थी। गाड़ी का लेट होना मेरे अंदर खीझ पैदा कर रहा था लेकिन रंजना की यादों ने इस चालीस पैंतालीस मिनट के अन्तराल का अहसास ही नहीं होने दिया।
परसों जब दफ्तर में रंजना का फोन आया तो सिर से पांव तक मेरे शरीर में खुशी और आनन्द की मिलीजुली एक लहर दौड़ गई थी। फोन पर उसने बताया था कि वह इस रविवार को मसूरी एक्सप्रेस से दिल्ली आ रही है और उसे उसी दिन शाम चार बजे की ट्रेन लेकर कानपुर जाना है। बीच का समय वह मेरे संग गुजारना चाहती थी। उसने पूछा था- ''क्या तुम आओगे स्टेशन ?''
''कैसी बात करती हो रंजना ! तुम बुलाओ और मैं न आऊँ, यह कैसे हो सकता है ? मैं स्टेशन पर तुम्हारी प्रतीक्षा करता खड़ा मिलूँगा।''
फोन पर रंजना से बात होने के बाद मैं जैसे हवा में उड़ने लगा था। बीच का एक दिन मुझसे काटना कठिन हो गया था। शनिवार की रात बिस्तर पर करवटें बदलते ही बीती।
करीब चारेक बरस पहले रंजना से मेरी पहली मुलाकात दिल्ली में ही हुई थी- एक परीक्षा केन्द्र पर। हम दोनों एक नौकरी के लिए परीक्षा दे रहे थे। परीक्षा हॉल में हमारी सीटें साथ-साथ थीं। पहले दिन सरसरी तौर पर हुई हमारी बातचीत बढ़कर यहाँ तक पहुँची कि पूरी परीक्षा के दौरान हम साथ-साथ रहे, साथ-साथ हमने चाय पी, दोपहर का खाना भी मिलकर खाया। वह दिल्ली में अपने किसी रिश्तेदार के घर में ठहरी हुई थी। तीसरे दिन जब हमारी परीक्षा खत्म हुई तो रंजना ने कहा था- ''मैं पेपर्स की थकान मिटाना चाहती हूँ अब। इसमें तुम मेरी मदद करो।''
पिछले तीन दिनों से परीक्षा के दौरान हम दिन भर साथ रहे थे। अब परीक्षा खत्म होने पर रंजना का साथ छूटने का दुख मुझे अंदर ही अंदर साल रहा था। मैंने रंजना की बात सुनकर पूछा- ''वह कैसे ?''
''मैं दिल्ली अधिक घूमी नहीं हूँ। कल दिल्ली घूमना चाहती हूँ। परसों देहरादून लौट जाऊँगी।'' कहते हुए वह मेरे चेहरे की ओर कुछ पल देखती रही थी।
मैं उसका आशय समझ गया था। उसके प्रस्ताव पर मैं खुश था लेकिन एक भय मेरे भीतर कुलबुलाने लगा था। बेकारी के दिन थे। घर से दिल्ली में आकर परीक्षा देने और यहाँ तीन दिन ठहरने लायक ही पैसों का इंतज़ाम करके आया था। मेरी जेब में बचे हुए पैसे मुझे रंजना के साथ पूरा दिन दिल्ली घूमने की इजाज़त नहीं देते थे।
''दिल्ली तो मैं भी पहली बार आया हूँ, इस परीक्षा के सिलसिले में। घूमना तो चाहता हूँ पर...।''
''पर वर कुछ नहीं। कल हम दोनों दिल्ली घूमेंगे, बस।'' रंजना ने जैसे अन्तिम निर्णय सुना दिया। परीक्षा केन्द्र इंडिया गेट के पास था। वह बोली, ''कल सुबह नौ बजे तुम यहीं मिलना।''
यूँ तो मुझे परीक्षा समाप्त होते ही गांव के लिए लौट जाना था, पर रंजना की बात ने मुझे एक दिन और दिल्ली में रुकने के लिए मजबूर कर दिया। मैं पहाड़गंज के एक छोटे-से होटल में एक सस्ता सा कमरा लेकर ठहरा हुआ था। जेब में बचे हुए पैसों का मैंने हिसाब लगाया तो पाया कि कमरे का किराया देकर और वापसी की ट्रेन का किराया निकाल कर जो पैसे बचते थे, उसमें रंजना को दिल्ली घुमाना कतई संभव नहीं था। बहुत देर तक मैं ऊहापोह में घिरा रहा था- गांव लौट जाऊँ या फिर ...। रंजना की देह गंध मुझे खींच रही थी। मुझे रुकने को विवश कर रही थी। और जेब थी कि गांव लौट जाने को कह रही थी।
फिर मैंने एक फैसला किया। रुक जाने का फैसला। इसके लिए मुझे गले में पहनी सोने की पतली-सी चेन, अपनी जेब कट जाने का बहाना बनाकर पहाड़गंज में बेचनी पड़ी थी। यह चेन माँ ने मुझे अपनी सोने की एक चूड़ी तुड़वाकर बनवा कर दी थी। माँ और बापू को बताने के लिए मैंने एक बहाना गढ़ लिया था कि शहर में भीड़भाड़ में आते-जाते किसी ने साफ कर दी या कहीं गिर गई। यह कैसा आकर्षण था ? रंजना और मेरी मुलाकात अभी थी ही कितने दिन की ? मात्र तीन दिन ही तो हम मिले थे। पर कुछ था मेरे अन्दर कि मैं यह सब कुछ करने को तैयार हो उठा।
अगले दिन मैं समय से निश्चित जगह पर पहुँच गया था। रंजना भी समय से आ गई थी। वह बहुत सुन्दर लग रही थी। उसका सूट उस पर खूब फब रहा था। उसके चेहरे पर उत्साह और उमंग की एक तितली नाच रही थी। एकाएक मेरा ध्यान अपने कपड़ों की ओर चला गया। मैं घर से दो जोड़ी कपड़े लेकर ही चला था। मेरी पैंट-कमीज और जूते साधारण-से थे। मन में एक हीन भावना रह रह कर सिर उठा रही थी। मेरे चेहरे को पढ़ते हुए रंजना ने कहा था, ''तुम कुछ मायूस-सा लगते हो। लगता है, तुम्हें मेरे संग दिल्ली घूमना अच्छा नहीं लग रहा।''
''नहीं, रंजना। ऐसी बात नहीं।'' मेरे मुंह से बस इतना ही निकला था।
हम दोनों ने उस दिन इंडिया गेट, पुराना किला, चिड़िया घर, कुतुब मीनार की सैर की। दोपहर में एक ढाबे पर भोजन किया। सारे समय हँसती-खिलखिलाती रंजना का साथ मेरे तन-मन को गुदगुदाता रहा था।
साल भर बाद इंटरव्यू के सिलसिले में हम फिर मिले थे। हम फिर पूरा एक दिन दिल्ली की सड़कों पर घूमते रहे थे। इसी दौरान रंजना ने बताया कि उसके बड़े भाई यहाँ दिल्ली में एक्साइज विभाग में डेपूटेशन पर आने वाले हैं। उसने मुझे उनका पता देते हुए कहा था कि मैं उनसे अवश्य मिलूं।
कुछ महीनों बाद मुझे दिल्ली में भारत सरकार के एक मंत्रालय में नौकरी मिल गई। मैं रंजना के बड़े भाई साहब से उनके ऑफिस में जाकर मिला था। वह बड़ी गर्मजोशी से मुझसे मिले थे। उनसे ही पता चला कि नौकरी की ऑफर तो रंजना को भी आई थी, पर इस दौरान देहरादून के केन्द्रीय विद्यालय में बतौर अध्यापक नियुक्ति हो जाने के कारण उसने दिल्ली की नौकरी छोड़ दी थी। मैं उन्हें अपने ऑफिस का फोन नंबर देकर लौट आया था। मुझे रंजना का दिल्ली में नौकरी न करना अच्छा नहीं लगा था। फिर भी, मुझे उम्मीद थी कि रंजना से मेरी मुलाकात अवश्य होगी। कुछ माह बाद रंजना के बड़े भाई साहब दिल्ली से चंडीगढ़ स्थानांतरित हो गए। अब रही-सही उम्मीद भी जाती रही। लेकिन, परसों जब अचानक रंजना का फोन आया तो मेरी उम्मीद जैसे जिन्दा हो उठी।
ट्रेन शोर मचाती हुई प्लेटफॉर्म पर लगी तो मैं अपनी यादों के समन्दर से बाहर निकला। रंजना ने मुझे प्लेटफॉर्म पर खड़ा देख लिया था। ट्रेन से उतरकर वह मेरी ओर बढ़ी। आज वह पहले से अधिक सुन्दर लग रही थी। सेहत भी उसकी अच्छी हो गई थी। सामान के नाम पर उसके पास एक बड़ा-सा अटैची था और कंधे पर लटकता एक छोटा-सा काला बैग। उसने कुली को आवाज़ दी। मैंने कहा, ''कुली की क्या ज़रूरत है। तेरे पास एक ही तो अटैची है। मैं उठा लूंगा।'' और मैंने अटैची पकड़ लिया था।
प्लेटफॉर्म पर चलते हुए रंजना ने कहा, ''मनीष, मेरे पास चार-पाँच घंटों का समय है। कानपुर जाने वाली शाम चार बजे वाली गाड़ी की मैंने रिजर्वेशन करा रखी है। ऐसा करती हूँ, सामान मैं यहीं क्लॉक रूम में रखवा देती हूँ और रिटायरिंग रूम में फ्रैश हो लेती हूँ। फिर चलते हैं, ठीक।''
मुझे रंजना का यह प्रस्ताव अच्छा लगा। मैं जहाँ रह रहा था, वह जगह स्टेशन से काफी दूर थी, वहाँ आने-जाने में ही दो घंटे बर्बाद हो जाने थे। रिटायरिंग रूम में फ्रैश होने के बाद रंजना ने अटैची को क्लॉक-रूम में रखवाया और फिर हम दोनों स्टेशन से बाहर निकले। सवा ग्यारह बजे रहे थे। मैंने पूछा- ''किधर चलें ?''
“मनीष, मुझे कुछ ज़रूरी शॉपिंग करनी है पहले।“
“ठीक है… कहाँ चलना है ?” मैंने पूछा ।
''करोल बाग चलते हैं।'' रंजना जैसे पहले से ही तय करके आई थी।
मैंने एक ऑटो वाले से बात की और हम करोल बाग के लिए चल दिए। ऑटो में सट कर बैठी रंजना की देहगंध मुझे दीवाना बना रही थी। मैंने चुटकी ली, ''पहले से कुछ मुटिया गई हो। टीचर की नौकरी लगता है, रास आ गई है।''
''तुम्हें मैं मोटी नज़र आ रही हूँ ?'' रंजना ने ऑंखें तरेरते हुए मेरी ओर देखकर कहा।
''मोटी न सही, पर पहले से सेहत अच्छी हो गई है। और सुन्दर भी हो गई हो।''
''अच्छा ! पहले मैं सुन्दर न थी ?''
''मैंने यह कब कहा ?''
''अच्छा बताओ, तुम्हें मेरी याद आती थी?'' हवा से चेहरे पर आए अपने बालों को हाथ से पीछे करते हुए रंजना ने पूछा।
''बहुत! मैं तो तुम्हें भूला ही नहीं।''
''अच्छा !'' इस बार रंजना की मुस्कराहट में उसके मोती जैसे दांतों का लिश्कारा भी शामिल था।
''तुमने दिल्ली वाली नौकरी की ऑफर क्यों ठुकराई ? यहाँ होती तो हम रोज मिला करते।''
''दरअसल मुझे दफ्तर की दिन भर की नौकरी से टीचर की नौकरी बहुत पसंद है। इसलिए जब अवसर मिला, वह भी केन्द्रीय विद्यालय का तो मैं उसे ठुकरा न सकी।''
तभी, ऑटो वाले ने करोलबाग के एक बाजार में ऑटो रोक दिया। हम उतर गए। ऑटो वाले को रंजना पैसे देने लगी तो मैंने रोक दिया। पैसे देकर हम दोनों बाजार में घूमने लगे। रंजना कई दुकानों के अन्दर गई। सामान उलट-पुलट कर देखती रही। कीमतें पूछती रही। भाव बनाती रही। उसे देखकर मुझे लगा, रंजना को शॉपिंग का अच्छा तजुर्बा हो जैसे। हमें बाजार में घूमते एक घंटे से ऊपर हो चुका था लेकिन रंजना ने अभी तक कुछ भी नहीं खरीदा था। मैंने पूछा, ''रंजना, तुम्हें लेना क्या है ?''
उसने मेरी ओर देखा और हल्का-सा मुस्करा दी। फिर, वह उसी दुकान में जा घुसी जहाँ हम सबसे पहले गए थे। वह कपड़ों की दुकान थी। काफी देर बाद उसने दो रेडीमेड सूट खरीदे। पैसे देने लगी तो मैंने उसे रोक दिया। थोड़ी न-नुकर के बाद वह मान गई। मैंने पैसे दिए और सूट वाले थैले पकड़ लिए। फिर वह एक और दुकान में गई और तुरन्त ही बाहर निकल आई। वह मुझे बाजू से पकड़कर खींचती हुई -सी आगे बढ़ी और एक दूसरी दुकान में जा घुसी। उसने दो साड़ियाँ पसंद कीं। इस बार उसने अपना बटुआ नहीं खोला। साड़ियाँ कीमती थीं, मैंने पैसे अदा किए और हम दुकान से बाहर आ गए। बाहर निकलकर वह बोली, ''शॉपिंग करना कोई आसान काम नहीं ।''
फिर वह फुटपाथ पर लगी दुकानों पर झुमके, बालियाँ और नेल-पालिश देखने लगी। पूरा बाजार घूम कर उसने दो-चार चीजें खरीदीं। मैंने घड़ी की तरफ देखा- दो बजने वाले थे।
''मनीष, मुझे जूती खरीदनी है।'' रंजना के कहने पर मैं उसे जूतियों वाले बाजार में ले गया। थैले उठाये मैं उसके पीछे-पीछे एक दुकान से दूसरी, दूसरी से तीसरी और तीसरी से चौथी दुकान घूमता रहा।
रंजना के संग घूमना हालाँकि मुझे अच्छा लग रहा था पर मैं एकांत में बैठकर उसके साथ बातें भी करना चाहता था। रंजना को लेकर जो स्वप्न मैंने देखे थे, उनके बारे में मैं उसे बताना चाहता था। मैंने सोचा था, रंजना घंटा, डेढ़-घंटा शॉपिंग करेगी, फिर हम किसी रेस्तरां में बैठकर लंच के साथ-साथ कुछ बातें भी शेयर करेंगे। समय मिला तो किसी पॉर्क में भी बैठेंगे। पर मेरी यह इच्छा पूरी होती नज़र नहीं आती थी।
रंजना तीन बजे तक सैंडिल ही पसंद करती रही। सैंडिल लेकर जब हम सड़क पर आए तो उसे जैसे एकाएक कुछ याद हो आया। वह रुक कर बोली, ''मनीष, एक चीज़ तो रह ही गई।''
''क्या ?'' सामान उठाये मैंने पूछा।
मेरे चेहरे पर आई खीझ को जैसे उसने पढ़ लिया था, बोली, “बस, आखिरी आइटम…छोटा-सा अटैची या बैग लेना है।''
मैं कुछ न बोला। चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलने लगा।
मुझे जोरों की भूख लगी हुई थी। मैंने पूछा, ''रंजना, तुम्हें भूख नहीं लगी? कुछ खा लेते हैं कहीं बैठ कर।''
उसने पहली बार अपनी कलाई पर बंधी घड़ी की ओर देखा था और समय देखकर हड़बड़ा उठी थी।
''नहीं-नहीं, मनीष। देर हो जाएगी। तीन बीस हो रहे हैं। चार बजे की ट्रेन है। अब ऑटो लो और चलो यहाँ से।''
ऑटो कर जब हम स्टेशन पहुँचे पौने चार हो रहे थे। उसने फटाफट क्लॉक रूम से अपना अटैची लिया। छोटा-छोटा सामान अपने हाथों में ले कर बोली, ''जल्दी करो, मनीष। कहीं गाड़ी न छूट जाए।''
ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर लगी हुई थी। सामान उठाये मैं रंजना के पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। मेरी साँस फूल रही थीं। एकबार मन हुआ, कुली को बुला लूँ। लेकिन दूसरे ही क्षण अपने इस इरादे को रद्द करके मैं रंजना के पीछ-पीछे चलता रहा। लगभग दौड़ते हुए रंजना ने अपना कोच ढूँढ़ा। यह एक टू-टायर डिब्बा था। मैंने उसके सारे सामान को उसकी सीट पर और सीट के नीचे व्यवस्थित करके रख दिया था। खिड़की के पास बैठ कर अब वह रूमाल से अपने माथे का पसीना पोंछ रही थी। ट्रेन छूटने में कुछ मिनट ही बाकी थे।
मैं डिब्बे से नीचे उतरा और रंजना के लिए पानी की बोतल लेने दौड़ा। पानी की बोतल लेकर लौटा तो देखा- प्लेटफॉर्म पर खड़ा एक युवक खिड़की के पास बैठी रंजना से बातें कर रहा था। दोनों की पीठ मेरी ओर थी। उनके बीच होती वार्तालाप ने मेरे कदम जहाँ के तहाँ रोक दिए।
''मुझे पहचाना ? मैं राकेश का दोस्त, कमल। राकेश जब आपके घर आपको देखने गया था, मैं उसके साथ था।''
''ओह आप !''
''मैं लखनऊ जा रहा हूँ। पिछले डिब्बे में मेरी सीट है। मैंने आपको डिब्बे में चढ़ते देख लिया था। आप किधर जा रही हैं ?''
''कानपुर।''
''कौन रहता है वहाँ ?''
''मेरी मौसी का घर है कानपुर में। उनकी बेटी का विवाह है। मेरे घरवाले बाद में आएँगे, मैं कुछ पहले जा रही हूँ।''
''वह कौन है जो आपके साथ आया है ?''
''वो... वो तो बड़े भाई साहब का कोई परिचित है। यहीं दिल्ली में नौकरी करता है। भाई साहब ने फोन कर दिया था। बेचारा सुबह से मेरे संग कुलियों की तरह घूम रहा है।''
मेरे अंदर जैसे कुछ कांच की तरह टूटा था। कहाँ मैं अपनी दोस्ती को रिश्ते में बदलने के सपने देख रहा था और कहाँ रंजना ने मुझे दोस्त के योग्य भी नहीं समझा।
सिगनल हो गया था। वह युवक अपने डिब्बे में चला गया था। मैंने आगे बढ़कर खिड़की से ही पानी की बोतल रंजना को थमाई और धीमे स्वर में पूछा, ''कौन था ?''
''मेरे मंगेतर का दोस्त।'' रंजना ने मुस्कराते हुए बताया ही था कि ट्रेन आगे सरकने लगी। रंजना ने हाथ हिलाकर ‘बॉय-बॉय’ करने लगी। आगे बढ़ती ट्रेन के साथ मैं कुछ दूर तक दौड़ना चाहता था, पर न जाने मेरे पैरों को क्या हो गया था। वे जैसे प्लेटफॉर्म से ही चिपक गए थे। मैं जहाँ खड़ा था, वहीं खड़ा रह गया- जड़वत-सा !
धीमे-धीमे गाड़ी रफ्तार पकड़ती गई। मेरे और रंजना के बीच का फासला लगातार बढ़ता चला गया। देखते देखते रंजना एक बिंदु में तबदील हो कर एकाएक अदृश्य हो गई।
मैं भारी कदमों से स्टेशन से बाहर निकला। मुझे बेहद गरमी महसूस हुई। इस मौसम को न जाने अचानक क्या हो गया था। सवेरे तो अच्छा-भला और खुशनुमा था, पर अब आग बरसा रहा था। क्या वाकई मौसम गरम था या मेरे अंदर जो आग मच रही थी, यह उसका सेक था ?
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जन्म: 27–12–1953, मुरादनगर (उत्तर प्रदेश)शिक्षा: स्नातक, मेरठ विश्वविद्यालयकृतियाँ: ‘यत्कचित’, ‘रोशनी की लकीर’ (कविता संग्रह)‘दैत्य तथा अन्य कहानियाँ’, ‘औरत होने का गुनाह’‘आखिरी पड़ाव का दु:ख’(कहानी-संग्रह)‘कथाबिंदु’(लघुकथा–संग्रह),‘मेहनत की रोटी’(बाल कहानी-संग्रह)लगभग 12 पुस्तकों का पंजाबी से हिंदी में अनुवाद, जिनमें“काला दौर”, “कथा-पंजाब – 2”, कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा पंजाबी कहानियाँ”, “पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं”, “तुम नहीं समझ सकते”(जिन्दर का कहानी संग्रह), “छांग्या रुक्ख”(बलबीर माधोपुरी की दलित आत्मकथा) और “रेत” (हरजीत अटवाल का उपन्यास) प्रमुख हैं।सम्पादन अनियतकालीन पत्रिका ‘प्रयास’ और मासिक ‘मचान’ ।ब्लॉग्स: सेतु साहित्य( उत्कृष्ट अनूदित साहित्य की नेट पत्रिका )http://www.setusahitya.blogspot.com/वाटिका(समकालीन कविताओं की ब्लॉग पत्रिका)http://www.vaatika.blogspot.com/साहित्य सृजन( साहित्य, विचार और संस्कृति का संवाहक)http://www.sahityasrijan.blogspot.com/
गवाक्ष (हिंदी–पंजाबी के समकालीन प्रवासी साहित्य की प्रस्तुति)
http://www.gavaksh.blogspot.com/सृजन–यात्रा ( सुभाष नीरव की रचनाओं का सफ़र)http://www.srijanyatra.blogspot.com/पुरस्कार/सम्मान: हिन्दी में लघुकथा लेखन के साथ-साथ पंजाबी-हिन्दी लघुकथाओं के श्रेष्ठ अनुवाद के लिए ‘माता शरबती देवी स्मृति पुरस्कार, 1992’ तथा ‘मंच पुरस्कार, 2000’ से सम्मानित।सम्प्रति : भारत सरकार के पोत परिवहन मंत्रालयमें अनुभाग अधिकारी(प्रशासन)।सम्पर्क: 372, टाईप–4, लक्ष्मी बाई नगर, नई दिल्ली–110023ई मेल: subhashneerav@gmail.comhttp://www.subhneerav@gmail.com/दूरभाष : 011–24104912(निवास)09810534373

Sunday, May 31, 2009

वातायन - जून, २००९


हम और हमारा समय
हिन्दी साहित्य में दूसरों को पढ़ने की परम्परा कम अपने लिखे को पढ़वाने की आकांक्षा अधिक देखने में आती है. प्रायः देखने में आता है कि आलोचक (अपवादस्वरूप कुछ को छोड़कर ) दूसरों के पढ़े से काम चला लेते हैं. यही कारण है कि किसी लेखक की लगातार उन्हीं कहानियों की चर्चा करते रहते हैं जिनकी चर्चा किन्ही कारणों से हो चुकी होती है , भले ही लेखक ने उससे भी अच्छी कहानी/ उपन्यास बाद में लिखा हो. ये उन्हीं कुछ लेखकों के नामों का पिष्टपेषण करते रहते हैं जिनके नाम उनके सामने परोस दिए जाते हैं. यही कारण है कि लेखकों का एक बड़ा वर्ग इनके लिए अछूत बना रहता है. जबकि हकीकत यह है कि वही अछूत वर्ग अच्छा और लंबे समय तक साहित्य के मैदान में टिका रहता है, क्योंकि दूसरों की बैसाखियों के सहारे लंबी यात्रा नहीं की जा सकती .
और पुरस्कार ---- उनकी स्थिति हिन्दी में जितनी दुर्भाग्यपूर्ण है उतनी शायद किसी अन्य भाषा में नहीं है. पुरस्कारों के लिए साहित्यकार बेशर्मी की किसी भी हद तक जा सकने के लिए तैयार रहते हैं. तंत्र- मंत्र और षडयंत्र करते हैं और संस्थाएं और उससे जुड़े पदाधिकारियों के विषय में क्या कहा जाये. शायद वे जुगाड़ के सामने नतमस्तक हो जाने के लिए विवश हो जाते हैं या उनका अपना विवेक ही नहीं होता . कम से कम ’केन्द्रीय साहित्य अकादमी’ का उदाहरण तो दिया ही जा सकता है जहां किसी नोवोदित/नवोदिता की पहली कृति को पुरस्कार से नवाज दिया जाता है जबकि कितने ही वरिष्ठ लेखकों की सुध तक नहीं ली जाती. ’कुरु-कुरु स्वाहा’ , तथा ’कसप’ जैसे कालजयी उपन्यास लिखने वाले मनोहरश्याम जोशी की याद अकादमी को उनकी मृत्यु से पहले आयी. और यदि बात ’हिन्दी अकादमी’, दिल्ली की करें तो कृष्ण बलदेव वैद जैसे वरिष्टतम लेखक की औकात वह साहित्यकार पुरस्कार (इक्कीस हजार) से अधिक आंकने को तैयार नहीं, जबकि कितने ही लल्लू लाल और जगधर लालों को यह पुरस्कार उसने अंधे की रेवड़ी की भांति बांटा . वैद जी की प्रशंसा करनी चाहिए जिन्होंने इस अति विवादित पुरस्कार को लौटाने में कोई संकोच नहीं किया . कश्मीर प्रसंग पर अरुधंती राय का मैं विरोधी हूं लेकिन उन्होंने भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने से इंकार करके स्तुत्य कार्य किया था.
वातायन के जून अंक में प्रस्तुत है स्व. हजारी प्रसाद द्विवेदी पर युवा कवि राधेश्याम तिवारी का आलेख -’आकाशधर्मी गुरु की परम्परा’, वरिष्ठ चित्रकार और साहित्यकार हरिपाल त्यागी की दो कविताएं और युवा कथाकार और कवियत्री इला प्रसाद की कहानी -’बैसाखियां’.
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आलेख

(आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी : १९ मई, पुण्य तिथि पर विशेष )

आकाशधर्मी गुरु की परम्परा

राधेश्यम तिवारी

डॉ. नामवर सिंह की पुस्तक, ’दूसरी परम्परा की खोज’ मैंने दो बार पढ़ी . पहली बार तब जब मैं इंटर में था और दूसरी बार करीब उसके आठ वर्षों बाद. इसे पढ़ते हुए ही आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य को पढ़ने की ललक पैदा हुई थी. उसी क्रम में पहले ’चारु चन्द्रलेख’ एवं ’बाणभट्ट की आत्मकथा’ उपन्यास पढ़े . बाद में ’कबीर’ एवम ’सूर साहित्य’ पढ़ा तो एक पाठक के रूप में द्विवेदी जी से और गहरे जुड़ा. उस समय यह भी लगा था कि एक लेखक से जुड़ने के लिए उससे दैहिक रूप से मिलना जरूरी नहीं है. बल्कि बिना मिले जुड़ना अधिक सुखकर होता है, क्योंकि तब जुड़ने का एक मात्र माध्यम लेखक का साहित्य होता है. दैहिक रूप से मिलने के बाद कई बार बनी-बनाई धारणाएं खंडित होती हैं. ऎसा इसलिए होता है कि लेखकों को हम उसी रूप में देखना चाहते हैं जैसा उनका लेखन होता है. लेकिन दुर्भाग्य से हिन्दी में ऎसा साम्य कम ही लेखकों में देखने को मिलता है. ’दूसरी परम्परा की खोज’ ने द्विवेदी जी के साहित्य से मुझे जोड़ा इसके लिए इस कृति का मैं रिणी हूं. हिन्दी में इसी तरह की एक दूसरी पुस्तक है जिसने मुझे शरदचंद्र के साहित्य से जोड़ा. वह है विष्णु प्रभाकर का ’आवारा मसीहा’ . लेकिन एक पाठक के रूप में द्विवेदी जी की आलोचना पुस्तक एवम निबंधों ने मुझे ज्यादा प्रभावित किया. हांलाकि इसका यह अर्थ नहीं कि उनके उपन्यास किसी भी दृष्टि से कमतर हैं. सच तो यह है कि यह किसी भी पाठक की रुचि पर भी निर्भर करता है कि उसके अध्ययन की दुनिया क्या है. आचार्य द्विवेदी की आलोचना पुस्तक- ’हिन्दी साहित्य की भूमिका’, ’हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’, ’मेघदूत: एक पुरानी कहानी’, ’सूर साहित्य’, ’कबीर, कालिदास की लालित्य योजना’, ’मध्यकालीन बोध का स्वरूप,’ ’मृत्युंजय रवींद्र’ आदि ने मुझे गहरे प्रभावित किया. उनके निबंधों में आलोक पर्व, कल्पलता, प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद, देवदास , कुटज, अशोक के फूल आदि को पढ़ते हुए अक्सर ऎसा लगा कि द्विवेदी जी के निबंधों को प्रत्येक रचनाकारों को अवश्य पढ़ना चाहिए. उनके निबंधों से विषय की गहराई और भाषा का संस्कार तो मिलता है, जिसकी तुलना हम कम से कम हिन्दी के किसी दूसरे निबंधकार से नहीं कर सकते.

’दूसरी परम्परा की खोज’ पढ़ी तो एक बात अनायास ही मन में आयी. वह भी तब जब नामवर जी ने निराला से आचार्य द्विवेदी जी की तुलना करते हुए लिखा है - "द्विवेदी जी और निराला
में अद्भुत समानता है. निराला के बारे में जैसा कि कहा गया है, बंगाल के सांस्कृतिक जागरण से प्रेरणा लेते हुए भी निराला अपने जनपद के लोक जीवन से बहुत गहराई तक सम्बद्ध थे. और उनके जीवन और साहित्य के बहुत से क्रान्तिकारी श्रोत इस लोक जीवन से ही फूटे थे. इसी प्रकार द्विवेदी जी के जीवन और साहित्य का क्रांतिकारी श्रोत स्वयं उनके अपने जनपद बलिया का लोक जीवन है. असल पूंजी यही है . शांति निकेतन ने इसे सिर्फ संस्कार दिया." अर्थात निराला एवं आचार्य द्विवेदी की जड़ें अपनी जमीन से गहरे जुड़ी रहीं. जिस लेखक के जीवन में इस तरह अपनी जमीन और समाज से जुड़ाव नहीं होगा वह आखिर कैसा लेखन करेगा. वह भले ही यह भ्रम पालता फिरे कि उसका लेखक इतना महान है कि सामान्य जन की पहुंच से परे है. उसका संबन्ध किसी खास जगह से न होकर वैश्विक है. पूरे विश्व का बोझ उठाने वाले ऎसे कवि-लेखक बहुत दिनों बाद यह समझ पाते हैं कि उनके पांव के नीचे कोई जमीन नहीं है. सच्चाई तो यह है कि जो लेखक-कवि अपने समाज के प्रति कृतज्ञ नहीं होता वह विश्व के प्रति क्या होगा. निराला और आचार्य द्विवेदी अपनी जमीन के रचनाकार थे. इसीलिए वे बार-बार अपने जनपद में लौटते रहे उन्हें अपनी संस्कृति के उस पक्ष की तलाश थी जिसे कुछ परम्परावादी लोग एक खास वर्ग की पूंजी मान बैठे थे. यानी परम्परा की लाश ढो रहे थे. निराला और आचार्य द्विवेदी ने यह तलाश की कि परम्परा सिर्फ वही नहीं है कि जिसे अब तक लाश की तरह ढोया जाता रहा. वह इससे अलग भी है और वह है मनुष्य की मुक्ति की परम्परा . यानी हमारी परम्परा हमें घेरती नहीं बल्कि हमें मुक्त करती है. इस संबंध में डॉ. नामवर सिंह ’दूसरी परम्परा की खोज’ की भूमिका में लिखते हैं -- "वे आकाशधर्मी गुरु थे. हर पौधे को बढ़ने के लिए उन्मुक्तता देने के विश्वासी. यह उन्मुक्तता ही उनकी परम्परा का मूल स्वर है. लेकिन यह उन्मुक्तता जितनी सहज दिखती है उसे समझ पाना उतना सहज नहीं है." द्विवेदी जी ने इस परम्परा की खोज अपनी ही जमीन से की है. इसके लिए उन्हें कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी.

इस संदर्भ में एक बात और जो चकित करती है वह यह कि हिन्दी के दो शीर्ष आलोचक डॉ. राम विलाश शर्मा एवं डॉ. नामवर सिंह ने जिन लेखकों पर सर्वाधिक गंभीरता से काम किया है उनमें निराला और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं. दोनों ही आलोचक घोषित रूप से मार्क्सवादी आलोचक हैं. जबकि इनके आदर्श निराला और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कभी भी यह घोषणा नहीं की कि वे किसी वाद से जुड़े हैं. फिर भी इनके प्रति इन आलोचकों के जुड़ाव में कोई कमी नहीं रही. डॉ. नामवर सिंह ने लिखा है -- "यह बात तब की है जब १९५० में वे (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी) शांतिनिकेतन से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राचार्य होकर आए और एम.ए. अंतिम वर्ष के छात्र के रूप में मुझे उनके चरणों में बठकर कुछ सीखने का सभाग्य प्राप्त हुआ."

गुरु के चरणॊं में सीखने का यह जो विनम्र भाव है वह कबीर के यहां भी मौजूद है. कबीर तो गुरु को कुछ मामलों में गोविन्द से भी बड़ा मानते हैं. क्योंकि गोविन्द तक पहुंचने का रास्ता गुरु ही बताता है. नामवर जी को गोविन्द की जरूरत नहीं थी, क्योंकि वे मार्क्सवादी हैं .वह ऎसे गुरु के पक्षधर हैं जो ज्ञान के स्तर पर चेतना सम्पन्न हों. आचार्य द्विवेदी वैसे ही गुरु थे.

ऎसे आकाशधर्मी गुरु के प्रति यह कृतज्ञ भाव हमें मनुष्यता के करीब लाता है साथ इससे यह भी बोध होता है कि हमारी परम्परा में मार्क्स से बहुत पहले प्रगतिशील विचार जन्म ले चुका था. जहां से आचार्य द्विवेदी एवम निराला को रचनात्मक ऊर्जा मिलती रही. इसके लिए उन्हें कहीं बाहर झांकने की जरूरत नहीं पड़ी. जीवन के प्रति आस्था और प्रगतिशीलता उनके रक्त में था. उनकी आधुनिक दृष्टि एवं प्रगतिशीलता दिखावटी नहीं थी. नामवर जी लिखते हैं -- "आधुनिकता भी उनके लिए एक नया फैशन नहीं, बल्कि भावबोध के स्तर की वस्तु है." सच तो यह है कि आज ऎसे ही गुरुओं से कुछ सीखने की जरूरत है . ऎसे गुरुओं के साथ जुड़कर ही मुक्ति का मार्ग तलाशा जा सकता है. इनके साथ बंध कर रहना बंधन नहीं मुक्ति है. इस संदर्भ में मुझे अपनी ही कविता की कुछ पंक्तियां याद आती हैं :

’’ऊंचे आकाश में
कुलांचे भरती पतंगें,
सोचती हैं खुद पर
यह बंधन भी, कितना अजीब है
कि दूर-दूर तक लिए फिरता है."
*****
युवा कवि-पत्रकार राधेश्याम तिवारी का जन्म देवरिया जनपद (उत्तर प्रदेश) के ग्राम परसौनी में मजदूर दिवस अर्थात १ मई, १९६३ को हुआ।अब तक दो कविता संग्रह - 'सागर प्रश्न' और 'बारिश के बाद' प्रकाशित. हिन्दी की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।सम्पादन - 'पृथ्वी के पक्ष में' (प्रकृति से जुड़ी हिन्दी कविताएं)पुरस्कार : राष्ट्रीय अज्ञेय शिखर सम्मान एवं नई धारा साहित्य सम्मान.
संपर्क : एफ-119/1, फ़ेज -2,अंकुर एनक्लेवकरावल नगर,दिल्ली-110094
मो० न० – 09350135756

कविता



हरिपाल त्यागी की दो कविताएँ
कभी-कभी
कभी-कभी
मेहरबान हो उठते हैं
फूल क्यारी पर
खुद-ब-खुद
सहमे हुए बच्चे
कभी-कभी उछलने लगते हैं
खुद-ब-खुद
उमंग, उछाह और
किलकारियों के मुक्त छंद में
कभी-कभी
जाल पर फिदा हो जाती हैं
मछलियाँ
खुद-ब-खुद
शब्दों में
भरपूर ताकत के बावजूद
धरी रह जाती है तमाम कोशिश
कभी-कभी
पास... बहुत पास चली आती है कविता
खुद-ब-खुद।

डस्टबिन से उठती आवाज़
मैं आपके द्वारा
छांट दिया गया कूड़ा-कचरा हूँ
क्या आप पुनर्विचार करने का
कष्ट करेंगे जनाब ?
कुछ तो ऐसा भी छूट गया होगा
आपकी पारखी नज़र से
जो मुझ में श्रेष्ठ है
और/बचा हुआ है
आपके उपभोग की वस्तु होने से अभी तक
कुछ तो छूट ही गया होगा
आपकी मदभरी लापरवाह निगाहों से
पूरी चौकसी के बावजूद
कुछ तो...
मालूम से नामालूम तक मैं पसरा पड़ा हूँ
आपके इस डस्टबिन तक ही नहीं
आपके दिमाग तक भी पैठ है मेरी
मैं बता सकता हूँ आप को आपकी औकात
क्या आप गौर फरमाएँगे हुजूर ?
मैं खोल हूँ आपकी उस बुलट का
जिसकी बारूद आपने
जीवनमूल्यों और मानवता के
पेट में उतार दी है
मेरे ही ख़िलाफ आप कर रहे हैं मेरा इस्तेमाल
फिर भी
कुछ तो छूट ही गया होगा आपकी पैनी निगाह से
जो मुझमें और मेरे अलावा अभी शेष है
और काफी है आपका अस्तित्व मिटा देने के लिए
क्या आप पुनर्विचार करेंगे ?
00
उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के महुवा गांव मे 20 अप्रैल, 1934 को जन्मे हरिपाल त्यागी शिक्षा प्राप्त करने के बाद विवाहोपरान्त 1955 में आजीविका की तलाश में पिता के साथ दिल्ली आ गये. चित्रकला, काष्ठ शिल्प कार्य और लेखन को अभिव्यक्ति का माध्यम चुना. अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं उल्लेखनीय पुस्तकों में पेण्टिंग्स तथा साहित्यिक रचनाएं प्रकाशित एवं संगृहीत. अनेक नगरों-महानगरों में एकल चित्रकला प्रदर्शनियां आयोजित एवं सामूहिक कला-प्रदर्शनियों में भागीदारी.'आदमी से आदमी तक'(शब्दचित्र एवं रेखाचित्र) भीमसेन त्यागी के साथ सहयोगी पुस्तक. 'महापुरुष' (साहित्य के महापुरुषों पर केन्द्रित व्यंग्यात्मक निबन्ध) एवं रेखाचित्र प्रकाशित.दो उपन्यास, एक कहानी संग्रह तथा संस्मरणॊं की एक पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य. 'भारतीय लेखक' (त्रामासिक पत्रिका) का सम्पादन.साहित्य एवं कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अनेक बार पुरस्कृत-सम्मानित. देश-विदेश में पेण्टिंग्स संग्रहित.एफ़- 29, सादतपुर विस्तार, दिल्ली-110094फोन : 011-22961856E-mail : haripaltyagi@yahoo.com

कहानी


बैसाखियाँ

इला प्रसाद
इस बार वह पूरी तरह तैयार हो कर आई थी । एक दिन पहले ही कम्प्यूटर पर देख लिया था , नाइन्टीन सिक्स्टी पर सेन्ट पैट्रिक्स डे की परेड दोपहर दो बजे से शाम चार बजे के बीच थी । रविवार होने की वजह से और सहूलियत थी । उसने कई काम कल ही खत्म कर लिए थे ।
यह आइरिश त्योहार हमेशा उसे होली की याद दिलाता है और मार्च के महीने में होने की वजह से अक्सर ही होली या तो बीत चुकी होती है या फ़िर आनेवाली होती है । सेन्ट पैट्रिक्स डे यानि हरे रंगों की बहार ! हरी शर्ट , हरी टोपी , हरे मोतियों की माला और आँखॊं पर हरे रंग के फ़्रेम का चश्मा । कुछ ने हरा रंग चेहरे पर पोत रखा था । हरा गुलाल भी दिखाई पड़ा । हरियाली सब ओर । वसंत के आगमन की सूचना देता हुआ , संत पैट्रिक ने नाम पर मनाया जाने वाला यह आइरिश त्योहार अब अमेरिका की जिन्दगी का हिस्सा हो चुका है । यूँ तो उसने देखा है कि खुलता हुआ हरा रंग ही - जैसे कि घास का होता है - हर ओर छाया होता है लेकिन हरे के बाकी शेड भी देखने को मिल जाते हैं । अमूमन वह भी उस दिन कोई हरी शर्ट डाल लेती है अपनी ब्लू जीन्स पर और भीड़ में शामिल हो जाती है । उसे यह परेड अच्छी लगती है और यदि परेड के दौरान दर्शकों की तरफ़ फ़ेंके गए चाकलेट, मोतियों की माला, कूपन आदि में से शैमरॉक ( तीन पत्तियों के आकार वाला ) का चिन्ह यदि उसे मिल गया तो वह आम आयरिश की तरह मान लेती है कि यह उसके लिए सौभाग्य लाने वाला है । दरअसल ऐसा ही उसके साथ होता भी आया है। पहली बार वह जबरन इस परेड के दर्शकों में शामिल हुई थी । वह सप्ताह भर का सौदा- सुलुफ़ लेने बाजार निकली थी और लौटते वक्त जाना कि घर तक पहुंचने के रास्ते बन्द हैं । सड़्क पर शेरिफ़ की गाड़ियाँ हार्न देती घूम रही थीं । फ़ुट्पाथों पर लोग जमे थे और किसी भी तरह कार निकालने की गुंजाइश नहीं थी । मजबूरन उसने कार पार्किंग लॉट में कार पार्क की थी और सड़्क के दोनों ओर हजारों की संख्या में खड़े दर्शकों में शामिल हो गई थी । तब उसने पीली शर्ट पहनी हुई थी और कुछ भी हरा नहीं । वह भीड़ से अलग दिखाई दे रही थी कुछ थोडे़ से अन्य लोगों की तरह जो उसी की तरह शायद फ़ंस गये थे । हरे रंग के गुब्बारों और शैमरॊक के चिन्ह से सजी विभिन्न कम्पनियों का इश्तेहार लगाए हुए गाड़ियाँ , जिनकी खुली छतों से ढेर सारे लोग दर्शकों को लक्ष्य कर मालाएँ फ़ेंक रहे थे , एक - एक कर गुजरती रहीं । गुजरती हुई गाड़ियों को वह दिलचस्पी से देखती रही थी । दर्शकों में बच्चे अधिक थे और उनके अभिभावक पिछली पंक्तियों में खड़े चाकलेट आदि लूटने में उनकी सहायता कर रहे थे । एक ट्र्क या कार गुजरती और बीड्स- बीड्स की गुहार मच जाती । हैप्पी सेन्ट पैट्रिक्स डे के नारों से आकाश गूंज उठता । "प्राउड टू बी एन आयरिश " के नारे गुजरती गाड़ियों पर पढ़ कर वह मुस्कराती रही थी । तरह तरह की गाड़ियाँ - कोई जूते के आकार की , कॊई घर बना हुआ ..... बड्लाइट की ट्रक से उस शराब का विज्ञापन करती गाड़ियाँ की-चेन फ़ेंक रही थीं जिसमें कार्डबोर्ड की बडलाइट की बोतल जुड़ी हुई थी । सबकुछ हरे रंग का । बीच-बीच में बच्चों की टोलियाँ खूबसूरत हरे रंग की ड्रेस पहने जिमनास्टिक के करतब भी दिखा रही थीं । कुछ गीत गाते हुए बच्चे भी गुजरे । एक म्यूजिक कम्पनी की गाड़ी कर्णप्रिय धुनें बजाती गुजर गई । कुल मिला कर सुषमा को यह जुलूस बहुत अच्छा लगा था । दर्शनीय!
हालाँकि उसने बाकी लोगों की तरह चिल्लाकर बीड्स नहीं माँगे थे तब भी काफ़ी कुछ उसके पैरों के पास आकर गिरा था । कई रंगों की मोतियों की मालाएँ, चाकलेट और एक टिन की बनी चमकीली तीन पत्ती भी । बीड्स वे लें जो ईसाई हैं , उसे क्या ....! उसने सोचा था किन्तु फ़िर सारा कुछ बटोरती चली गई । वह दिन अच्छा गुजरा था । मन में जैसे हरियाली छा गई थी । बहुत कुछ आँखों के रास्ते भी मन में उतरता है।
जब उसी दिन पोस्ट किए गए रिसर्च पेपर की स्वीकृति की सूचना , करीब महीने भर बाद मिली तो उसने मान लिया कि यह तीन पत्ती सचमुच शुभ शगुन है । अगले साल वह फ़िर से जुलूस देखने गई । उसने भीड के साथ उछल - उछल कर बहुत कुछ लपका था । उसके हाथ कई शैमरॉक के चिन्ह वाले रैपर लगे चाकलेट आए थे । उसके बाद जब अचानक ही एक दिन लुइस आकर उसके पैसे लौटा गया तो वह सोचने पर मजबूर हो गई थी । इस तीन पत्ती के आकार में कुछ तो है । सेन्ट पैट्रिक डे एक शुभ दिन का नाम है। तब से हर साल वह अपनी किस्मत जानने को इस भीड़ में शामिल हो जाती है । फ़िर कोई तीन पत्ती मिलेगी क्या ? कोई चाकलेट ही, जिसके रैपर पर यह चिन्ह बना हो ! बल्कि अब तो वह अपनी मित्र मंडली को भी यह जुलूस देखने के लिए प्रोत्साहित करती है । दूसरी सारी वजहों को किनारे कर देने पर भी यह जुलूस दर्शनीय तो है ही और थोड़ी देर के लिए आप बच्चों में शामिल हो कर खुद भी बच्चे हो जाते हैं ।
यही सब सोच कर उसने वन्दिता को फ़ोन किया था ।
"कल सेन्ट पैट्रिक्स डे है । आ रही है ?"
"वह क्या होता है?"
"कम ऒन यार ! तेरे दो बच्चे हैं और तुझे ही नहीं मालूम ?"
"बता न ।"
सुषमा ने विस्तार से जानकारी दी थी । शैमरॉक और गोल्डेन बीड्स से जुड़े आयरिश विश्वास और संत पैट्रिक के बारे में उसने कम्प्यूटर पर पढ़ा था । ईसाई मान्यताएँ यूँ भी उसके लिए नई नहीं थीं । वह बचपन से ईसाई कान्वेन्ट स्कूळ में पढ़ी थी । ईसाई धर्म भी की भी इतनी शाखाएँ है और एक चर्च दूसरे से अपनी मान्यताओं को लेकर कितने भिन्न हो सकते है उसी जीसस क्राइस्ट पर विश्वास के बावजूद, यह जरूर उसने अमेरिका आने के बाद जाना । यहाँ आकर ईसाइयत के इतने विभिन्न रूप देखने को मिलेंगे यह उसके लिए भारत में रहते हुए कल्पनातीत था । और अभी तो वह अपना सारा ज्ञान वन्दिता के सामने उड़ेल रही थी । लेकिन वन्दिता तो वन्दिता ठहरी । अमेरिका में उसी की तरह पिछले पाँच साल से रहने के बावजूद थोड़ी भी नहीं बदली । अपनी भारतीय मंडली में घूमेगी । हर महीने उसके घर सत्यनारायण कथा या उस जैसा ही कोई उत्सव होगा । विश्व हिन्दू परिषद से जुड़ी होने के कारण भी उसका दायरा काफ़ी बड़ा है । आए दिन भीड़ लगी होती है । कभी कभी सुष को आश्चर्य होता है , कैसे संभालती है यह सबकुछ । दो बच्चे, नौकरी , पति और आए दिन चले आने वाले अतिथि । फ़िर वह हर किसी के घर पूजा में जायेगी भी । यह दीगर बात है कि उसी की वजह से सुष भी कुछ पर्व त्यौहार मना लेती है । होळी - दीवाली में उसके घर चली जाती है तो अकेला नहीं लगता !
"हाँ , हाँ , समझ गई । अरे अभी चैत्र के नवरात्र चल रहे हैं , यह समय तो शुभ होता ही है !"
सुष को लगा यह कभी नहीं सुधरेगी !
'"अरे यार , बच्चों को तो भेज । वे मजे कर लेंगे । सब होते हैं , हिन्दू , मुस्लिम, ईसाई । आयरिश और नन- आयरिश । यह अमेरिका है!"
"अच्छा, अगली बार देखेंगे । अपने सब डिवीजन में होली- मिलन है आज । ड्राइव तो मुझे ही करना होगा न । नाइटीन सिक्सटी बहुत दूर है यहाँ से।"
"तो मिनट मेड पार्क चली जा । डाउन टाउन । वहाँ का जुलूस तो और अच्छा है । तेरा दीपू तो कह रहा था कि उसे मालूम है सेन्ट पैट्रिक्स डे क्या होता है ।"
"हाँ , सब स्कूल में सीख आते हैं । मैं तो बहन परेशान हो गई । वाइ एम सी ए स्विमिंग के लिए ले जाओ । फ़िर कराटे सीखना है । होम वर्क करवाऒ । इन्हें तो फ़ुरसत ही नहीं मिलती । सब मुझे ही करना है ।"
"चल, जाने दे ।"
सुषमा जानती है , वह नहीं आयेगी । न ही बच्चों को उसके साथ जाने देगी । अमेरिका आने के बाद भी भारतीय पति अन्य मामलों में चाहे बदल जाएँ , पत्नी को लेकर भारतीय बने रहते हैं । यह सुविधाजनक है !
लेकिन सुषमा जायेगी । उसे तीन पत्ती चाहिए !
इस बार उसके पास लखनवी अंगूरी रंग का कुर्ता है - उसका सबसे प्रिय और इस वक्त उसने वही पहना हुआ है ।
यह नाइन्ट्न सिक्स्टी अक्सर उसे भ्रमित करता है । पहली बार तो जब सुना था तो उसकी समझ में ही नहीं आया था कि यह संख्या किसी रास्ते को सूचित करती है । अभी भी वह अक्सर गलत मोड़ ले लेती है और गलत रास्ते पर पहुँच जाती है लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ । उसने कार सीयर्स के बड़े से गोदाम के पास पार्क की और कार की ट्रंक से कुर्सी निकाल ली । उसे लगा था कि वह लेट हो गई है लेकिन अभी परेड शुरू नहीं हुई थी । कई सारे दर्शक सड़क के दोनों ओर कुर्सियाँ डाले बैठे थे । पार्किंग लॉट में घुसने और निकलने का रास्ता भी कुर्सियों से पटा पड़ा था । वह नाइन्टिन सिक्स्टी के पीछे की तरफ़ से आई थी , इसीलिए घुस सकी थी । बैठनेवालों में तमाम बड़े थे । बच्चों की कतार तो उत्साह से भरी उचक उचक कर सड़्क के उस सिरे पर नजर लगाए थी जहाँ से जुलूस आनेवाला था । उसने एक कोने में अपनी मुड़नेवाली कुर्सी खोली और जम गई । उसके ठीक बगल में एक गोरी वृद्धा आँखों पर शैमरॉक के आकार का हरा चश्मा लगाए हुए है । उसे अपनी ओर देखता पाकर वह मुस्कराई । सुष ने भी इशारा कर दिया - बहुत सुन्दर ! वह खुश हो गई ।
इस बार फ़िर अगर शैमरॉक मिलता है तो जरुर उसका चयन होनेवाला है । वह इन्टरव्यू देगी । अब आगे पढ़ाई करने का उसका इरादा नहीं । वह व्यवस्थित होना चाहती है । अपनी जिन्दगी की अगली पारी खेलना चाहती है । अमेरिका से वापस लौटने का तो प्रश्न ही नहीं उठता । यहाँ की सुविधापूर्ण जिन्दगी की आद्त अब उसे भारत की धूल -पसीने भरी जिन्दगी से किनारा करने पर मजबूर करती है । उसने एक छोटा सा भारत अपने मन में बसा लिया है और उसी के साथ वह जीती चली जा रही है। जीती चली जायेगी । मन के उस कोने में जहाँ उसका देश बसता है ,वह अक्सर घूम आती है । अपने दोस्तों , गली -मुहल्लों , माँ बाप , भाई बहनों, फ़ूल- पौधों से बतिया लेती है और फ़िर अमेरिका में जीने लगती है , जो उसका वर्तमान है । वह जानती है यह उस जैसे तमाम भारतीयों का सच है । और वन्दिता चाहे अपने धर्म को लेकर आग्रही हो , देश को लेकर वह भी नहीं है ।
इस इंटरव्यू को लेकर वह कई दिनों से उधेड़्बुन में है । जाए न जाए । पहले तो लगता रहा था कि बुलावा ही नहीं आयेगा । वह अपने आप को इस स्थिति के लिए तैयार करती रही । इसके अतिरिक्त और कौन कौन सी कंपनियाँ हैं जहाँ वह आवेदन कर सकती है । कितने कम पैसों मे वह गुजारा कर सकती है । बड़ी कम्पनी यानी बड़ा पैसा यानी बड़ी प्रतियोगिता । उसके लिए कितनी गुंजाइश बचती है , वह हिसाब लगाती रही थी और अब जब इन्टर्व्यू में एक सप्ताह रह गया है वह इस जुलूस में अपनी किस्मत जानने आई है । तीन पत्ती मिली तो एयर टिकट बुक करवा लेगी ।
सहसा उसकी नजर अपने दूसरी ओर आकर खड़ी हो गई बारह - तेरह साल की मोटी सी, जो शायद स्पैनिश थी , बच्ची पर पड़ी । उसके दोनों हाथ बैसाखियों पर टिके थे और चेहरे पर गहरी उदासी थी । पहला खयाल जो सुषमा के मन में आया वह यह था कि यदि यह बैसाखियों पर न होती तो मोटापे की समस्या का ईलाज करवा रही होती । पिज्जा खा खाकर मोटे हुए माँ बाप बच्चों को असमय ही मोटापे की समस्या का शिकार बना देते हैं । लेकिन उसकी बगल में खड़ी स्त्री मोटी नहीं थी ।
सुष की कुर्सी की ठीक बगल में उस लड़की ने जगह ली । उसकी आँखें सुषमा से मिलीं लेकिन सुष की मुस्कुराहट के प्रत्युत्तर में वह स्त्री मुस्कुराई । वह लड़की नहीं । सुषमा को एक अजीब सी बेचैनी महसूस हुई । वह उसकी उदासी को समझ सकती थी । जहाँ आगे की लाइन में खड़े बच्चे उछ्ल उछलकर मालाएँ लूट रहे थे, खुशी से चिल्ला रहे थे , यह लड़की प्रस्तर-प्रतिमा सी अपनी बैसाखियों पर बस खड़ी थी । सुष को हैरत हुई कि क्यों नहीं इसकी माँ या अभिभाविका , जो भी यह औरत है , आगे बढ़्कर कुछ बीड़्स , कुछ चाकलेट इसके लिए बटोर लाती है । वह तो ऐसा कर ही सकती है । या कि इसे पीछे ही रोके रखने के लिए , कि यह भीड़ में अपनी और दुर्गति न कराए , वह पीछे खड़ी है ?
जुळूस अपने चरम पर था । सारी चीजें अगली पंक्तियों में खड़े लोगों द्व्रारा लपक ली जातीं । अभी तक सुष तक कुछ नहीं पहुंचा था । और कुछ नहीं तो भी उसे एक तीन पत्ती तो चाहिए , सोचती हुई वह अपनी कुर्सी से उठ कर कुछ आगे बढ़ गई ।
बस थोड़ा ही बढ़ी थी कि एक चाकलेट कैन्डी ठीक उसके पैरों के पास गिरी । वह कोई बच्ची तो नहीं , जो लालीपॉप खाए । उसने वह चाकलेट पीछे मुड़कर उस बच्ची की तरफ़ बढ़ा दी "दिस इज फ़ॉर यू ।"
उस बच्ची के उदास चेहरे पर एक क्षीण मुस्कराह्ट बिजली की चमक सी कौंधकर पल भर में विलीन हो गई ।
सुष ने फ़िर जुलूस की तरफ़ नजर दौड़ाई । लगता नहीं कि उसके हिस्से में कुछ आनेवाला है । इस बार गुजरती गाड़ियों में विज्ञापन ज्यादा है । शैमरॉक के डिजाइन ज्यादा हैं लेकिन कुछ वैसा दर्शकों की तरफ़ नहीं आ रहा । लेकिन शायद यह भी सच नहीं था । छोटे से ट्रक पर बैठे दो बच्चों ने शैमराक के आकार के बैलून फ़ुलाए और एक-एक दोनों दिशाओं में दर्शकों की तरफ़ उछाल दिए । एक बच्चे और दूसरी ओर एक लम्बे आदमी द्वारा वे हवा में ही लपक लिए गए । सुष मायूस हो गई । बस इतना ही तो चाहिए था उसे फ़िर तो वह वापस हो लेती । क्या पता उसी तरह यह बच्ची भी कुछ ऐसा ही सोचकर यहाँ आई हो । उसने मुड़्कर बच्ची की तरफ़ देखा । वह चेहरा भावहीन था । जैसे कॊई उम्मीद कहीं बची ही न हो।
सुष आगे बढ़कर पहली लाइन में खड़े बच्चों की पंक्ति के ठीक पीछे आ गई । बस एक तीन पत्ती , बाकी सबकुछ वह उस बच्ची को दे देगी । तीन पत्ती मिली तो वह इन्टर्व्यू के लिए जायेगी वरना नहीं । इतनी दूर बोस्टन जाऒ , जब कि वहाँ बर्फ़ पड़ रही है, और अगर होना ही नहीं है तो क्या जरूरत है जहमत उठाने की ।
एक सुनहली माला उस तक आ कर गिरी । यह भी शुभ् शगुन है , उसने सोचा और फ़िर पीछे जाकर माला उस बच्ची को दे दी। यह उसकी पहली माला थी, । उसने गले में डाल ली । अबतक अगली पंक्ति के बच्चे मालाओं से लद चुके थे । हरी, सुनहली , नीली , पीली , लाल, बैगनी - हर रंग की मालाएँ । पालिथीन चाकलेटों से भरे ।
विपरीत दिशा में देख रही , उसके पैरों से फ़िर कुछ टकराया । सफ़ेद मोतियों की माला ।
इसे वह अपने लिए रखेगी ।
पीछे खड़ी बच्ची के गले में अब दो मालाएँ थीं । एक उसके साथ की स्त्री ने उठाई थी ।
अगली दो चाकलेट फ़िर सुष ने बच्ची को दे दी । वह फ़िर मुस्कराई । लेकिन थैंक्यू जैसा कोई शब्द उसके मुँह से नहीं निकला । शायद वह बाकी बच्चों से अपनी तुलना कर रही थी जो मालाओं, चाकलेटों ,और तरह तरह के पैकेटों , टी शर्ट आदि से लदे फ़ंदे खुशी से कूद रहे थे ।
गाडियाँ गुजरती रहीं । अब वे पीछे खड़े लोगों को लक्ष्य कर रहे थे । बहुत कुछ पीछे भी पहुँच रहा था । सुष फ़िर से पीछे ह्ट आई थी । और एक एक कर कई मालाएँ वह बटोर चुकी थी । हर गाड़ी के गुजरने के साथ उसकी मायूसी बढ़ती जा रही थी । कोई तीन पत्ती उसे नहीं मिलनेवाली । हालाँकि ऐसी मालाएँ भी फ़ेंकी गई थीं जिनमें तीन पत्ती यानी शैमरॉक गुँथे हुए थे । उसमें से कुछ भी सुष तक नहीं पहुँचा था । एक घंटे के जुळूस का तीन चौथाई पार हो चुका था ।
सुष को लौटना था ।
सहसा बारिश शुरू हो गई । लोग भागने लगे । सुष ने अपनी मालाऎँ गिनीं । एक में सिक्स फ़्लैग का कूपन था । दूसरे से फ़ूलों के आकार की सुगन्धित मोमबत्तियाँ लटक रही थीं एक कूपन के साथ कि वह अपनी मोमबत्ती इस दूकान पर आकर ले जाए । यानि कि जो उसे चाहिए था उसके सिवा बहुत कुछ मिल गया था उसे लेकिन उसके अन्दर का विश्वास जगाने के लिए कुछ नहीं । एक एक कर सारी मालाएँ उसने गले में डाल लीं । उसने पीछे लौटते हुए देखा , उस बच्ची के गले में भी तकरीबन इतनी ही मालाएँ थीं , हालाँ कि वह अपनी जगह से हिली भी नहीं थी , सिवाय एक बार के , जब एक पीली माला उन दोनों के बीच आ कर गिरी थी और सुष ने उससे कहा था "टेक इट ।" तब उसने झुक कर माला उठा ली थी ।
चमकती हुई , शीशे की मोतियों की मालाओं की तरह उस लड़की का चेहरा प्रसन्न्नता से चमक रहा था । मालाओं की चमक शायद अब उसके अन्दर भरने लगी थी । चेहरे पर शान्ति थी। वह मुस्करा रही थी ।
सुषमा ने अपनी बाकी चाकलेट्स भी उसे दे दीं । इतने चाकलेटों का वह करेगी क्या । किसी पर शैमरॉक का चिन्ह भी नहीं !.........
बच्ची ने पहली बार उसे "थैंक यू" कहा ।
शायद उसे उसका इच्छित सबकुछ मिल गया था !
भागते हुए लोगों में वह वृद्धा भी थी जिसने हरा चश्मा पहना था - शैमराक की डिजाइन का । " यह क्या बारिश होने लगी ।" वह सुषमा से अंग्रेजी में बोली ।
"मैं भारतीय हूँ । हमारे यहाँ ऐसी हल्की बारिश को लोग शुभ मानते हैं । "सुषमा ने कहा ।
"अच्छा।" वह वृद्धा प्रसन्नता से मुस्कराई ।
"हाँ । आपको मानना चाहिए कि यह सेन्ट पैट्रिक्स डॆ हैप्पी होने वाला है ।"
"हैप्पी सेन्ट पैट्रिक्स डे ।" वह हँसी ।
कुछ हो न हॊ , सुषमा ने सोचा , उस वृद्धा का विश्वास उसने दुबारा जगा दिया है । अपनी मान्यताओं से जोड़कर । जबकि वह खुद इस बात में यकीन नहीं करती !
आकाश काले बादलों से भरता जा रहा था । वसंत का स्वागत करते पेड़ों में नई पत्तियाँ थीं लेकिन उनका घने छायादार स्वरूप में ढलना बाकी था कि कोई उनके नीचे खड़ा होकर खुद को बारिश से अंशत: ही सही , बचा सके । सुष और वह वृद्धा कुछ दूर तक साथ साथ पार्किंग ळॉट में चलते रहे । काले आसमान के नीचे ,सुष को उसकी दूधिया हँसी बहुत पवित्र सी लगी । उसे घर जाना था । बाकी बचे काम निबटाने थे । वह वृद्धा शायद कुछ और कहना चाहती थी लेकिन सुष आगे बढ़ ली । नीचे हरा रंग अब भी सब तरफ़ फ़ैला था । भागते हुए लोग एक हरी दीवार की मानिन्द नजर आ रहे थे । बैसाखियों पर खड़ी लड़की अब भी गले में मालाएँ पहने शान्त भाव से खड़ी मुसकरा रही थी । शायद उनलोगों की कार आस पास ही कहीं थी । सुषमा ने सोचा, जाने दो । इन्टरव्यू वह दे देगी । घर लौटकर पहला काम एयर टिकट बुक करना । फ़िर इंटरव्यू की तैयारी । आज का दिन तो बीत गया । एक दिन यात्रा का । तो बस पाँच दिन बचे हैं । ठीक से तैयारी करेगी । चयन हो न हो ! जाने का खर्च तो कम्पनी दे ही रही है । और उसे क्या करना है । कड़ी प्रतियोगिता है इसीलिए साहस मरा हुआ है लेकिन यदि सफ़ल हुई तो बॉस्टन अच्छी जगह है । बड़ा पैसा भी है । चलॊ , छोड़ॊ, वह भी क्या अन्धविश्वास पाल रही है !
सहसा उसने मह्सूस किया कि बैसाखियों पर सिर्फ़ वह लड़की नहीं वह खुद भी खड़ी थी और कई सारे अन्य लोग । फ़र्क इतना है कि आज उसकी बैसाखियाँ उतर गईं । । वह मुक्त है -अपने पाँवों से चलने को स्वतंत्र !
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झारखंड की राजधानी राँची में जन्म। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सी. एस. आई. आर. की रिसर्च फ़ेलॊशिप के अन्तर्गत भौतिकी(माइक्रोइलेक्ट्रानिक्स) में पी.एच. डी एवं आई आई टी मुम्बई में सी एस आई आर की ही शॊध वृत्ति पर कुछ वर्षों तक शोध कार्य । राष्ट्रीय एवं अन्तर-राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित । भौतिकी विषय से जुड़ी राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय कार्यशालाओं/ सम्मेलनों में भागीदारी एवं शोध पत्र का प्रकाशन/प्रस्तुतीकरण।कुछ समय अमेरिका के कालेजों में अध्यापन।छात्र जीवन में काव्य लेखन की शुरुआत । प्रारम्भ में कालेज पत्रिका एवं आकाशवाणी तक सीमित।"इस कहानी का अन्त नहीं " कहानी , जो जनसत्ता में २००२ में प्रकाशित हुई , से कहानी लेखन की शुरुआत। अबतक देश-विदेश की विभिन्न पत्रिकाओं यथा, वागर्थ, हंस, कादम्बिनी, आधारशिला , हिन्दीजगत, हिन्दी- चेतना, निकट, पुरवाई , स्पाइल आदि तथा अनुभूति- अभिव्यक्ति , हिन्दी नेस्ट, साहित्य कुंज सहित तमाम वेब पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ प्रकाशित। "वर्तमान -साहित्य" और "रचना- समय" के प्रवासी कथाकार विशेषांक में कहानियाँ/कविताएँ संकलित । डा. अन्जना सन्धीर द्वारा सम्पादित "प्रवासिनी के बोल "में कविताएँ एवं "प्रवासी आवाज" में कहानी संकलित। कुछ रचनाओं का हिन्दी से इतर भाषाओं में अनुवाद भी। विश्व हिन्दी सम्मेलन में भागीदारी एवं सम्मेलन की अमेरिका से प्रकाशित स्मारिका में लेख संकलित। कुछ संस्मरण एवं अन्य लेखकों की किताबों की समीक्षा आदि भी लिखी है । हिन्दी में विज्ञान सम्बन्धी लेखों का अनुवाद और स्वतंत्र लेखन। आरम्भिक दिनों में इला नरेन के नाम से भी लेखन।कृतियाँ : "धूप का टुकड़ा " (कविता संग्रह) एवं "इस कहानी का अंत नहीं" ( कहानी- संग्रह) ।लेखन के अतिरिक्त योग, रेकी, बागवानी, पर्यटन एवं पुस्तकें पढ़ने में रुचि।सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन ।सम्पर्क : 12934, MEADOW RUNHOUSTON, TX-77066USAई मेल ; ila_prasad1@yahoo.com

Monday, May 4, 2009

वातायन - मई, २००९





हम और हमारा समय

साहित्य में आस्था का प्रश्न

रूपसिंह चन्देल

हम आज क्रूर साहित्यिक समय में जी रहे हैं. आपा-धापी की स्थिति है. एक साहित्यकार दूसरे के कंधों को रौंदते हुए आगे निकलने की विकृत मानसिकता का शिकार है. वह लिखने से अधिक दूसरे को धराशायी करने में अपनी ऊर्जा का अपव्यय कर रहा है. ऎसा इसलिए कि या तो वह कुंठाग्रस्त है या असुरक्षा-भाव का शिकार. असुरक्षा का भाव अपने शब्दों के प्रति अविश्वास और अनास्था से उत्पन्न होता है. अपने लिखे के प्रति अविश्वास और अनास्था उसे पाठकों के प्रति शंकालु बनाती है और यह भाव ही उसे अपनी कृतियों को चर्चा में लाने के लिए विभिन्न प्रकार के अतार्किक हथकंडे अपनाने के लिए विवश करती हैं. यदि वह पूंजीपति या रिश्वतखोर सरकारी अफसर है तब उन सतही हथकंडॊं के साथ ऎसे समीक्षकों, सम्पादकों और पत्रकारों को पटा लेना उसके लिए सहज होता है जो एक बोतल ह्विस्की में बिकने को तैयार रहते हैं. पिछले दस वर्षों में यह प्रवृत्ति अधिक ही बढ़ी है. ऎसे समय में हमें विष्णु प्रभाकर जैसे साहित्यकारों की याद बरबस हो आती है, जिन्होंने आजीवन बिना किसी वाद-विवाद में पड़े केवल और केवल साहित्य सृजन किया और आजीवन चर्चा में बने रहे.

कुछ समय पहले हिन्दी के दो वरिष्ठ साहित्यकार हमारे बीच नहीं रहे-- विष्णु प्रभाकर और यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र. विष्णु जी की ही तरह यादवेन्द्र जी भी न केवल मसिजीवी और एक अच्छे साहित्यकार थे, बल्कि एक अच्छे इंसान भी थे -- बेहद मिलनसार. हिन्दी के साथ उन्होंने राजस्थानी साहित्य को भी समृद्ध किया. लेकिन नेताओं की छींक को भी मुख-पृष्ठ पर खबर बनाने वाले हिन्दी के समाचार पत्रों ने यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र के लिए एक पंक्ति भी नहीं छापी---- कम से कम दिल्ली के राष्ट्रीय कहलवाने वाले समाचार पत्रों ने तो बिल्कुल ही नहीं. ’वातायन’ और ’रचना समय’ की ओर से दोनों साहित्यकारों को विनम्र श्रद्धांलि.

’वातायन’ के मई अंक में स्व. विष्णु प्रभाकर पर मेरे संस्मरण के अतिरिक्त प्रस्तुत है युवा कवियित्री , कथाकार और पत्रकार सुधा ओम ढींगरा की दस कविताएं और मुक्ति श्रीवास्तव का आलेख - ’इस्लामोफ़ोबिया और राजनीति’.

आशा है अंक आपको पसंद आयेगा.

संस्मरण

हिन्दी साहित्य के स्तंभ पुरुष
रूपसिंह चन्देल

११ अप्रैल, २००९ को हिन्दी साहित्य के वरिष्ठतम लेखक विष्णु प्रभाकर का निधन हो गया. वह गांधीवादी लेखन-परम्परा के अंतिम स्तंभ थे. वह इतने शांत और मृदुभाषी थे कि आश्चर्य होता था. मुझे नहीं लगता कि किसी व्यक्ति की बात तो दूर कभी किसी जानवर को भी उन्होंने सख्त लहजे में डांटा होगा. लंबे, गोरे-चिट्टे (वृद्धावस्था में भी चेहरा अंगारे की भांति देदीप्यमान था) सुडौल-देह-यष्टि के धनी विष्णु जी के साहित्यकार से मेरा परिचय १९६६-६७ (तब मैं हाई स्कूल में था) में ही हो गया था, लेकिन वह उनकी दो-चार बाल-कहानियों तक ही सीमित था. १९७८ में ’आवारा मसीहा’ पढ़ा और मैं उनका मुरीद हो उठा. उन दिनों मैं मुरादनगर में था और साहित्य की ओर लौट रहा था. वहां के साहित्यिक मित्र सुभाष नीरव से विष्णु जी के विषय में सुनता तो उनसे मिलने की आकांक्षा प्रबल हो उठती. मेरे स्व. मित्र प्रेमचन्द गर्ग उनके मुग्ध प्रशंसक थे. गर्ग जी का ताल्लुक भी शायद मुजफ्फर नगर (उत्तर प्रदेश) से था और विष्णु जी का जन्म वहीं हुआ था. अपने नगर-क्षेत्र का कोई व्यक्ति जब किसी भी क्षेत्र में उच्च शिखर पर पहुंच जाता है तब वहां के लोगों में उसकी चर्चा स्वाभाविक है.

मैंने ’आवारा मसीहा’ दोबार पढ़ा और विष्णु जी से मिलने की ललक और प्रबल हो उठी, लेकिन मिल नहीं पाया. ११ अक्टूबर, १९८० को मैं स्थायी रूप से दिल्ली आ बसा. अब किसी से भी मिलना सहज था.

विष्णु जी नियमित (दिल्ली में रहते हुए प्रतिदिन) कॉफी हाउस जाते थे . शनिवार की शाम कॉफी हाउस में साहित्यकारों की होती थी. विष्णु जी जाड़े के दिनों में शाम साढ़े पांच बजे और गर्मियों में कुछ देर से वहां पहुंचते और प्रायः गेट के सामने खुली छत पर एक मेज पर जा बैठते. आध-घण्टा में उनकी मेज के साथ दो-तीन मेजें और जुड़ जातीं और साहित्यकारों का जमघट लग जाता. ये वे दिन थे जब विष्णु जी के साथ नियमित बैठने वालों में वरिष्ठ कथाकार रमाकांत और कवि आलोचक राजकुमार सैनी अवश्य होते थे. विष्णु जी से कुछ दूर गेट से दक्षिण दिशा की ओर मार्क्सवादियों (इनमें कई छद्म मार्क्सवादी भी होते थे बाद में जिनके मुखौटे स्वतः उतर गये थे) का ग्रुप बैठता था और प्रायः देखने आता कि रमेश उपाध्याय जैसे एक-दो को छोड़कर विष्णु जी की ओर कोई अन्य नहीं आता था. इसे वैयक्तिक और वैचारिक संकुचन के अतिरिक्त अन्य कोई संज्ञा नहीं दी जा सकती.

एक शनिवार को शाम छः बजे कंधे से थैला लटकाये (उन दिनों यही फैशन था) मैं पहली बार कॉफी हाउस पहुंचा था. नवम्बर , १९८० की बात है. मेरे साथ सुभाष नीरव थे. विष्णु जी साहित्यकारों से घिरे हुए थे. इस दिन आलोचक डॉ. हरदयाल, डॉ. रत्नलाल शर्मा, वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी, कवि कांति मोहन-----लम्बी सूची है --- आदि पहुंचते थे. उस दिन मैंने केवल उनके दर्शन ही प्राप्त किये थे. संवाद नहीं हुआ. संवाद वहां मेरा किसीसे भी नहीं हुआ था, क्योंकि सबके लिए मैं एक अपरिचित चेहरा था.

उसके बाद मैं प्रतिमाह के दूसरे शनिवार कॉफी हाउस जाने लगा था. जाना प्रति शनिवार चाहता था, लेकिन पारिवारिक कारणॊं से यह संभव न था. कभी-कभी सरकारी अवकाश होने पर बीच में भी चला जाता . लेकिन जब भी मैं वहां गया विष्णु जी को लोगों से घिरा ही पाया. वह मेरे चेहरे से तो परिचित हो गये थे लेकिन मैं कौन हूं यह जता पाने में तीन-चार महीने व्यतीत हो गये थे. एक दिन मैं विष्णु जी के पहुंचने से पहले ही कॉफी हाउस जा पहुंचा और गेट के सामने ही एक मेज पर जा बैठा. पांच मिनट बाद ही वह मुझे गेट पर दिखे और जब वह मेरी मेज की ओर बढ़ते दिखे तब मैं उठ खड़ा हुआ था उनके स्वागत के लिए.

"अरे, आप खड़े क्यों हो गये ? बैठें." मेरे सामने कुर्सी पर थैला लटकाते हुए मुस्कराकर वह बोले थे.

बातों का सिलसिला चल पड़ा था. उन्होंने जितना मुझसे पूछा मैंने उससे अधिक उन्हें अपने बारे में बताया. वह मुस्कराते रहे-- एक निर्छ्द्म - सरल और मोहक मुस्कान.

****

विष्णु जी कॉफी हाउस से तीन किलोमीटर दूर कुण्डेवालान में रहते थे, जो अजमेरी गेट से चावड़ी बाजार जाने वाली सड़क पर पड़ता है. अजमेरी गेट से चावड़ी बाजार जाते हुए दाहिनी ओर ऊंचा हवेली-नुमा उनका मकान था, जहां वह किरायेदार थे. लेकिन उनके पास इतनी अधिक जगह थी कि लंबे समय तक मैं उन्हें मकान मालिक ही समझता रहा था. साहित्य जगत में दो चीजें उनके नाम का पर्याय बन चुकी थीं -- एक शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय की उनकी जीवनी ’आवारा मसीहा’ और दूसरा उनका निवास.

मुझे विष्णु जी के और अधिक निकट आने का अवसर मिला १९८२ में जब प्रसिद्ध हिन्दी बाल साहित्यकार डॉ. राष्ट्रबन्धु ने अपनी पत्रिका ’बाल साहित्य समीक्षा’ का एक अंक विष्णु प्रभाकर विशेषांक के रूप में प्रकाशित करने का निर्णय किया और उसकी जिम्मेदारी मुझे सौंप दी, अर्थात उस अंक का अतिथि सम्पादक. सामग्री संचयन, बाल साहित्य संबन्धी उनके विचार जानने के लिए उनका साक्षात्कार आदि के सिलसिले में कई बार मुझे उनसे मिलने कुण्डेवालान जाना पड़ा था.

विष्णु जी साहित्य-साधक पुरुष थे. वह प्रतिदिन सुबह से दोपहर एक बजे तक लिखने-लिखवाने का काम करते थे. लंबे समय से कोई युवक या युवती उनके सहयोग के लिए उनके पास होता था. प्रायः वह सहयोग करने वालों को अच्छे सरकारी-गैर सरकारी संस्थानों में नौकरी दिलवा देते थे. बाद के दिनों में वह लेखन के लिए इन सहयोगियों पर ही निर्भर रहने लगे थे और उन्हें बोलकर लिखवाने लगे थे. मेरे पास उनके अनेक पत्र हैं, जिनमें हस्तलेख उन युवाओं के हैं, विष्णु जी के केवल हस्ताक्षर हैं. लेकिन नवें दशक के उत्तरार्द्ध तक के उनके पत्र उनके ही लिखे हुए हैं. वह हिन्दी के उन इने गिने लेखकों में थे, बल्कि यदि एक मात्र कहूं तो अत्युक्ति न होगी, जो न केवल बाल-साहित्य लिखने के पक्ष में बोलते थे, बल्कि स्वयं प्रभूत मात्रा में बाल साहित्य लिखा भी था. ’बाल साहित्य समीक्षा’ विशेषांक के लिए बातचीत के दौरान बहुत दुखी स्वर में उन्होंने कहा था, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिन्दी के लेखक बाल-साहित्य लिखना हेय समझते हैं. लिखने वाले के प्रति उनका दृष्टिकोण बदल जाता है. जबकि बांग्ला में साहित्यकार ही उसे मानते हैं जिसने बाल-साहित्य भी लिखा होता है. रूस के अनेक लेखकों का अपने बाल-साहित्य लेखन पर गर्व है."

विष्णु जी ने बहु-विधाओं पर कार्य किया. कहना उचित होगा कि शायद ही कोई विधा ऎसी रही होगी जिसमें उन्होंने लेखनी न चलायी हो. उनकी अनेक कहानियां उल्लेखनीय हैं, और ’धरती अब भी घूम रही है’ उनकी विश्वप्रसिद्ध कहानी है. जब मैं उनसे लंबी बातचीत के लिए अपने कवि मित्र अशोक आंद्रे के साथ उनके यहां गया तब उन्होंने विस्तार से इस कहानी के विषय में चर्चा की थी. उन्होंने वह कमरा भी दिखाया था जहां कुछ मित्रों के साथ बैठे वह किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे और वही चर्चा बाद में उस कहानी का कारण बनी थीं.

डॉ. कुमुद शर्मा (रीडर , हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) उन दिनों ’साहित्य अमृत’ पत्रिका से जुड़ी हुई थीं और उनका यह जुड़ाव संभवतः स्व. डॉ. विद्यानिवास मिश्र के कारण था, जो पत्रिका के प्रधान सम्पादक थे. कुमुद शर्मा ने एक दिन फोन पर पत्रिका के लिए विश्णु जी का साक्षात्कार लेने का मुझसे आग्रह किया. दरअसल उन्होंने कुछ प्रश्न बना रखे थे और मुझे उन्हीं पर चर्चा करनी थी. मेरे लिए केवल उन पर चर्चा करना कठिन था. विष्णु जी से लंबी बातचीत लंबे समय से मेरे जेहन में थी. समय नहीं निकाल पा रहा था. कुमुद के फोन ने उत्साह बढ़ाया और मैंने अशोक आंद्रे से अनुरोध किया कि वह अपना टेप रेकार्डर और कैमरा संभाल मेरा साथ दें. कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, अजीत कौर (पंजाबी) और एस.एल.भैरप्पा (कन्नड़ -- मैसूर) से बातचीत के दौरान भी अशोक ने मेरा साथ दिया था.

मैंने विष्णु जी से समय ले लिया और सुबह दस बजे मैं अशोक के साथ कुण्डेवालान में था. उस दिन उन्होंने अपने पी.ए. की छुट्टी कर दी थी या उन दिनों उनका कोई पी.ए. था ही नहीं. बातचीत प्रारंभ हुई. पहले प्रश्न के उत्तर के बाद विष्णु जी ने टेप रेकार्डर चेक करने के लिए कहा और टेप ने न सूं की न सां. उसने मौनवृत धारण कर लिया था. अब------ विष्णु जी मुस्कराये ----- वही सरल-निर्छद्म मुस्कान .मैं बोला, " विष्णु जी वक्त तो लगेगा---- लेकिन यदि आप तैयार हों तो आप बोलते रहें और मैं आपके उत्तर लिखता रहूंगा. " वह तैयार हो गये थे.

हमें तीन घण्टे लगे थे, लेकिन हमने विभिन्न विषयों पर खुलकर बातचीत की, जो टाइप के चौंतीस पृष्ठों में समायी थी. ’साहित्य अमृत’ के अंश को (जो छोटा ही था) छोड़कर विष्णु जी का साक्षात्कार टुकड़ों में कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ था.

विष्णु जी के साथ कानपुर यात्रा की सुखद स्मृति आज भी ताजा है. कानपुर का ’बाल कल्याण संस्थान’ प्रतिवर्ष फरवरी (प्रायः २७-२८ फरवरी) में हिन्दी और अहिन्दी भाषी बाल साहित्यकारों और नगर के दो प्रतिभाशाली छात्रों को पुरस्कार प्रदान करता है. यह कार्यक्रम डॉ. राष्ट्रबन्धु के सद्प्रयासों से लगभग तीस वर्षों से अबाधरूप से होता आ रहा है. दो दिवसीय कार्यक्रम चार सत्रों में होता है. १९९६में एक महत्वपूर्ण सत्र की अध्यक्षता के लिए विष्णु जी को बुलाया गया था. उसी सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में मैं भी आमंत्रित था. हमारे साथ स्व.डॉ रत्नलाल शर्मा और दिल्ली विश्वविद्यालय के एक महाविद्यालय में हिन्दी की रीडर डॉ. शकुन्तला कालरा भी थीं.

वह फरवरी की ठंडभरी सुबह थी. शताब्दी एक्स्प्रेस, जो नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से सुबह छः बजे के लगभग कानपुर के लिए जाती थी, से हमारा आरक्षण था. डॉ. रत्नलाल शर्मा यद्यपि योजना विभाग से वर्षों पहले अवकाश प्राप्त कर चुके थे, लेकिन किसी युवा से अधिक उत्साह था उनमें. हम सभी को पिक करने का जिम्मा उन्होंने अपने ऊपर लिया था. शर्माजी समय के बहुत पाबंद थे. जब हम विष्णु जी के यहां पहुंचे सुबह के साढ़े पांच बजे थे. उनके घर से स्टेशन मात्र पांच मिनट की दूरी पर था. उस यात्रा के दौरान विष्णु जी ने बचपन से लेकर युवावस्था के अपने अनेक संस्मरण सुनाये थे. उनके साथ वह एक अविस्मरणीय यात्रा थी.

२८ मार्च, १९९७ को सपरिवार मुझे दक्षिण भारत भ्रमण पर जाना था. लगभग सभी जगह मैंने ठहरने की व्यवस्था कर ली थी, लेकिन तिरुअनंतपुरम में कहां ठहरूंगा यह विचार-मंथन चल ही रहा था कि कॉफी हाउस में एक दिन विष्णु जी से इस विषय पर चर्चा हुई. बोले, "इसमें इतना सोचने की क्या बात है. ’केरल हिन्दी प्रचार समिति’ के सचिव डॉ. वेलायुधन नायर (अब स्वर्गीय) से बात कर लो. मेरा नाम ले लेना. कोई कठिनाई न होगी. बहुत ही प्यारे लोग हैं----- हिन्दी वालों का बहुत ही आदर करने वाले.." विष्णु जी के सुझाव पर मैंने केरल सूचना केन्द्र, नई दिल्ली से वेलायुधन नायर साहब का फोन नंबर लिया और विष्णु जी का उल्लेख करते हुए उन्हें अपनी समस्या बतायी. जब उन्हें ज्ञात हुआ कि मैं भी लेखक हूं वह बहुत प्रसन्न हुए. फोन पर छलकती उनकी प्रसन्नता मैं अनुभव कर पा रहा था. उन्होंनें स्टेशन से लेने, ठहरने, घुमाने आदि की जो व्यवस्था की उसका विस्तृत उल्लेख मैंने अपने यात्रा संस्मरण ’दक्षिण भारत के पर्यटन स्थल’ में किया है.

दरअसल विष्णु जी ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए अनगिनत बार दक्शिण भारत की यात्राएं की थीं. वहां उनकी बहुत प्रतिष्ठा थी---- विशेषरूप से केरल में. जात-पांत - क्षेत्रवाद, साहित्यिक राजनीति से वह बहुत ऊपर थे. उन्हें यह गर्व था कि उनके घर में बहुएं अहिन्दी भाषी प्रांतों से थीं या उनके घर की लड़कियों के विवाह अहिन्दी भाषियों के साथ हुए थे और वे सब सफल पारिवारिक जीवन जी रहे थे. वह वसुधैव कुटम्बकम मे विश्वास करने वाले व्यक्ति थे.

जैसा कि उल्लेख कर चुका हूं मुझे यह जानकारी बहुत बाद में हुई कि कुण्डेवालान का मकान उनका अपना नहीं था. कॉफी हाउस में एक दिन चर्चा सुनी कि उनके मकान पर रेलवे के एक ठेकेदार माफिया ने कब्जा कर लिया था और विष्णु जी उसके साथ मुकदमा में उलझे हैं. लेकिन उनके चेहरे - बातचीत से कभी ऎसा आभास नहीं मिला था कि वह परेशान थे. उनके चेहरे पर सदैव सरल मुस्कान विद्यमान रहती थी.

पश्चिमी दिल्ली में महाराणा एन्क्लेव में उनका अपना आलीशान मकान था --- यह तभी पता चला था. उनके पुत्र ने विज्ञापन के माध्यम से उसे उस माफिया को किराये पर दे दिया था. कुछ दिनों तक उसने किराया दिया, बाद में देना ही नहीं बंद कर दिया , बल्कि मकान खाली करने से भी इंकार कर दिया. उसने उससे भी आगे जाकर मकान के जाली कागजात तैयार करवाये, उसे विष्णु जी द्वार अपने एक मित्र को बेचा दिखाया , फिर उससे उसने स्वयं खरीद लिया. बात तत्कालीन सांसद शंकरदयाल सिंह के द्वारा गृहमंत्री राजेश पायलट तक पहुंची और जब विष्णु जी से पूछा गया कि आपको किसके विरुद्ध क्या शिकायत है तब वहां भी गांधीवादी भाव से उन्होंने कहा था, "मुझे किसी के खिलाफ कोई शिकायत नहीं है."

अंततः कोर्ट में उस माफिया की जालसाजी सिद्ध हुई थी और उसे जेल भेज दिया गया था. उसके तुरंत बाद विष्णु जी कुण्डेवालान छोड़ अपने घर आ गये थे. गृह-प्रवेश के बाद उन्होंने घर के सामने के पार्क में दावत दी थी, जिसमें बड़ी मात्रा में साहित्यकार-पत्रकार सम्मिलित हुए थे. उसके बाद भी अनेक बार मैं उनके उस आवास में उनसे मिलने गया था. लेकिन वहां पहुंचकर उनका नियमित कॉफी हाउस आने का सिलसिला टूट गया था.

१९९८ में मैंने अपना उपन्यास ’पाथर टीला’ उन्हें समर्पित किया और जब उन्हें भेंट किया तब वह बहुत ही संकुचित हो उठे थे. लेकिन पन्द्रह दिन के अंदर ही उसे पढ़कर उन्होंने उपन्यास की प्रशंसा करते हुए मुझे बधाई दी थी.

हिन्दी साहित्य में सदैव गुटबाजी से दूर ईमानदारी से काम करने वाले व्यक्ति को हाशिये पर डालने की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति रही है. विष्णु जी सदैव इसका शिकार रहे. जिस साहित्य अकादमी के वह सदस्य रहे थे उसने उनके ’आवारा मसीहा’ की उपेक्षा की थी. ’अर्द्धनारीश्वर’ को भी शायद ही पुरस्कार मिला होता यदि उस बार ज्यूरी में डॉ. शिवप्रसाद सिंह न होते. मीटिगं से लौटकर जब शिवप्रसाद जी होटल पहुंचे थे, मैं उनके कमरे में उनकी प्रतीक्षा कर रहा था. वह बहुत उत्तेजित थे और उनके विरुद्ध बोल रहे थे जो ’अर्द्धनारीश्वर’ का विरोध कर रहे थे . कुछ देर बाद शांत होने पर उन्होंने कहा था, "आखिर ’अर्द्धनारीश्वर’ को पुरस्कार दिलाने में सफलता मिल ही गई."

आजीवन विष्णु जी मसिजीवी रहे. अनेक पीढ़ियों का संग-साथ मिला उन्हें --- जैनेन्द्र जी से लेकर आजकी युवा पीढ़ी तक का . उनकी एक खूबी यह भी थी कि बीमारी से पहले तक वह नये से नये लेखक को पढ़ते रहे थे और अच्छा लगने पर सीधे लेखक को या पत्र-पत्रिका को रचना के विषय में अपनी राय देने में संकोच नहीं करते थे. अपने विचारों पर उनकी आस्था अडिग थी. शायद यही कारण रहा कि मरणॊपरांत उन्होंने अपनी देह ’अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान’ को दान करने का निर्णय किया था.

सच ही वह एक महान लेखक और विशाल हृदय व्यक्ति थे.